श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 15: ईश्वर के साम्राज्य का वर्णन  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक
त एकदा भगवतो वैकुण्ठस्यामलात्मन: ।
ययुर्वैकुण्ठनिलयं सर्वलोकनमस्कृतम् ॥ १३ ॥
 
शब्दार्थ
ते—वे; एकदा—एक बार; भगवत:—भगवान् के; वैकुण्ठस्य—भगवान् विष्णु का; अमल-आत्मन:—समस्त भौतिक कल्मष से मुक्त हुए; ययु:—प्रविष्ट हुए; वैकुण्ठ-निलयम्—वैकुण्ठ नामक धाम; सर्व-लोक—समस्त भौतिक लोकों के निवासियों के द्वारा; नमस्कृतम्—पूजित ।.
 
अनुवाद
 
 इस तरह सारे ब्रह्माण्डों का भ्रमण करने के बाद वे आध्यात्मिक आकाश में भी प्रविष्ट हुए, क्योंकि वे समस्त भौतिक कल्मष से मुक्त थे। आध्यात्मिक आकाश में अनेक आध्यात्मिक लोक हैं, जो वैकुण्ठ कहलाते हैं, जो पुरुषोत्तम भगवान् तथा उनके शुद्धभक्तों के निवास-स्थान हैं और समस्त भौतिक लोकों के निवासियों द्वारा पूजे जाते हैं।
 
तात्पर्य
 भौतिक जगत चिन्ताओं से पूर्ण है। सर्वोच्च लोक से लेकर निम्नतम लोक पाताल तक के सारे लोकों में सारे सजीव प्राणी चिन्ताओं और व्यग्रताओं से पूर्ण रहते हैं, क्योंकि भौतिक जगत में कोई भी प्राणी शाश्वत निवास नहीं कर सकता। किन्तु जीव वास्तव में शाश्वत हैं। उन्हें शाश्वतघर, शाश्वत धाम चाहिए, किन्तु भौतिक जगत में अस्थायी धाम स्वीकार करने के कारण वे स्वभावत: चिन्ता से ओतप्रोत रहते हैं। आध्यात्मिक आकाश में सारे लोक वैकुण्ठ कहलाते हैं, क्योंकि इन लोकों के निवासी सारी चिन्ताओं से मुक्त होते हैं। उनके लिए जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था तथा रोग का प्रश्न ही नहीं उठता, अतएव वे चिन्ताग्रस्त नहीं रहते। दूसरी ओर, भौतिक जगत के निवासी सदैव जन्म, मृत्यु, रोग तथा वृद्धावस्था से भयभीत रहते हैं, अतएव वे चिन्ताओं से ओतप्रोत रहते हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥