श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 15: ईश्वर के साम्राज्य का वर्णन  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक
वसन्ति यत्र पुरुषा: सर्वे वैकुण्ठमूर्तय: ।
येऽनिमित्तनिमित्तेन धर्मेणाराधयन् हरिम् ॥ १४ ॥
 
शब्दार्थ
वसन्ति—निवास करते हैं; यत्र—जहाँ; पुरुषा:—व्यक्ति; सर्वे—सारे; वैकुण्ठ-मूर्तय:—भगवान् विष्णु की ही तरह चार भुजाओं वाले; ये—वे वैकुण्ठ पुरुष; अनिमित्त—इन्द्रियतृप्ति की इच्छा से रहित; निमित्तेन—उत्पन्न; धर्मेण—भक्ति द्वारा; आराधयन्—निरन्तर पूजा करते हुए; हरिम्—भगवान् की ।.
 
अनुवाद
 
 वैकुण्ठ लोकों में सारे निवासी पुरुषोत्तम भगवान् के समान आकृतिवाले होते हैं। वे सभी इन्द्रिय-तृप्ति की इच्छाओं से रहित होकर भगवान् की भक्ति में लगे रहते हैं।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में वैकुण्ठ के निवासियों तथा रहन-सहन के स्वरूप का वर्णन हुआ है। उसके निवासी पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् नारायण जैसे होते हैं। वैकुण्ठ लोकों में कृष्ण का स्वांश नारायण के चतुर्भुजी रूप में प्रधान देव होता है और वैकुण्ठलोक के निवासी भी चतुर्भुजी होते हैं, जो भौतिक जगत की हमारी अवधारणा से सर्वथा विपरीत हैं। भौतिक जगत में कहीं भी हमें चार हाथों वाला मनुष्य नहीं मिलता। वैकुण्ठलोक में भगवान् की सेवा के अतिरिक्त अन्य कोई वृत्ति नहीं होती है और यह सेवा सोद्देश्य नहीं सम्पन्न की जाती। यद्यपि प्रत्येक सेवा का विशेष फल होता है, किन्तु भक्तगण कभी भी अपनी निजी इच्छाओं की पूर्ति की कामना नहीं करते। उनकी इच्छाएँ भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति करने से ही पूर्ण हो जाती हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥