श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 15: ईश्वर के साम्राज्य का वर्णन  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक
यत्र चाद्य: पुमानास्ते भगवान् शब्दगोचर: ।
सत्त्वं विष्टभ्य विरजं स्वानां नो मृडयन् वृष: ॥ १५ ॥
 
शब्दार्थ
यत्र—वैकुण्ठ लोकों में; च—तथा; आद्य:—आदि; पुमान्—पुरुष; आस्ते—है; भगवान्—भगवान्; शब्द-गोचर:—वैदिक वाङ्मय के माध्यम से समझा गया; सत्त्वम्—सतोगुण; विष्टभ्य—स्वीकार करते; विरजम्—अकलुषित, निर्मल; स्वानाम्— अपने संगियों का; न:—हमको; मृडयन्—सुख को बढ़ाते हुए; वृष:—साक्षात् धर्म ।.
 
अनुवाद
 
 वैकुण्ठलोकों में भगवान् रहते हैं, जो आदि पुरुष हैं और जिन्हें वैदिक वाङ्मय के माध्यम से समझा जा सकता है। वे कल्मषरहित सतोगुण से ओतप्रोत हैं, जिसमें रजो या तमो गुणों के लिए कोई स्थान नहीं है। वे भक्तों की धार्मिक प्रगति में योगदान करते हैं।
 
तात्पर्य
 आध्यात्मिक आकाश में भगवान् के साम्राज्य (धाम) को वेदों के वर्णनों से सुनने के अलावा किसी अन्य विधि से नहीं समझा जा सकता। कोई जाकर इसे देख नहीं सकता। इस भौतिक जगत में भी जो व्यक्ति किसी दूरस्थ स्थान पर मोटरवाहन द्वारा जाने का खर्च उठाने में असमर्थ हैं, वे उस स्थान के बारे में प्रामाणिक पुस्तकों के द्वारा ही जान सकते हैं। इसी तरह आध्यात्मिक आकाश में जो वैकुण्ठलोक हैं, वे इस भौतिक आकाश से परे हैं। आधुनिक विज्ञानी, जो अन्तरिक्ष में यात्रा करने का प्रयास कर रहे हैं, निकटतम लोक, चन्द्रमा तक भी जाने में कठिनाई का अनुभव कर रहे हैं, ब्रह्माण्ड के सर्वोच्च लोकों की बात तो दूर रही। इसकी कोई सम्भावना नहीं है कि वे भौतिक आकाश से परे आध्यात्मिक आकाश में प्रवेश करके स्वयं इन आध्यात्मिक वैकुण्ठ लोकों को देख सकेंगे। अत: आध्यात्मिक आकाश में ईश्वर के साम्राज्य को वेदों तथा पुराणों के प्रामाणिक विवरणों के माध्यम से ही समझा जा सकता है।

भौतिक जगत में तीन प्रकार के भौतिक गुण होते हैं—सतो, रजो तथा तमोगुण—किन्तु आध्यात्मिक जगत में रजो तथा तमोगुणों का नामोनिशान भी नहीं है। वहाँ केवल सतोगुण होता है, जो तमो या रजोगुणों के कल्मष से सर्वथा मुक्त होता है। भौतिक जगत में चाहे कोई व्यक्ति पूर्णतया सतोगुणी ही क्यों न हो वह भी तमो तथा रजोगुणों से कभी कभी प्रदूषित हो सकता है। किन्तु वैकुण्ठ जगत में, अर्थात् आध्यात्मिक आकाश में एकमात्र सतोगुण अपने शुद्धरूप में विद्यमान रहता है। भगवान् तथा उनके भक्तगण वैकुण्ठलोकों में निवास करते हैं और वे उसी दिव्यगुण अर्थात् शुद्ध सत्त्व

वाले होते हैं। वैकुण्ठलोक वैष्णवों को अत्यन्त प्रिय हैं और वैष्णवों के भगवद्धाम की ओर निरन्तर अग्रसर होने में भगवान् स्वयं अपने भक्तों की सहायता करते हैं।

 
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