श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 15: ईश्वर के साम्राज्य का वर्णन  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक
वैमानिका: सललनाश्चरितानि शश्वद्
गायन्ति यत्र शमलक्षपणानि भर्तु: ।
अन्तर्जलेऽनुविकसन्मधुमाधवीनां
गन्धेन खण्डितधियोऽप्यनिलं क्षिपन्त: ॥ १७ ॥
 
शब्दार्थ
वैमानिका:—अपने विमानों में उड़ते हुए; स-ललना:—अपनी अपनी पत्नियों समेत; चरितानि—कार्यकलाप; शश्वत्—नित्य रूप से; गायन्ति—गाते हैं; यत्र—जिन वैकुण्ठलोकों में; शमल—समस्त अशुभ गुणों से; क्षपणानि—विहीन; भर्तु:—परमेश्वर का; अन्त:-जले—जल के बीच में; अनुविकसत्—खिलते हुए; मधु—सुगन्धित, शहद से पूर्ण; माधवीनाम्—माधवी फूलों की; गन्धेन—सुगन्ध से; खण्डित—विचलित; धिय:—मन; अपि—यद्यपि; अनिलम्—मन्द पवन; क्षिपन्त:—उपहास करते हुए ।.
 
अनुवाद
 
 वैकुण्ठलोकों के निवासी अपने विमानों में अपनी पत्नियों तथा प्रेयसियों के साथ उड़ानें भरते हैं और भगवान् के चरित्र तथा उन कार्यों का शाश्वत गुणगान करते हैं, जो समस्त अशुभ गुणों से सदैव विहीन होते हैं। भगवान् के यश का गान करते समय वे सुगन्धित तथा मधु से भरे हुए पुष्पित माधवी फूलों की उपस्थिति तक का उपहास करते हैं।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक से प्रतीत होता है कि वैकुण्ठलोक समस्त ऐश्वर्यों से परिपूर्ण हैं। वहाँ विमान हैं जिनमें वहाँ के निवासी अपनी प्रेयसियों के साथ बैठकर आध्यात्मिक आकाश में विचरण करते हैं। वहाँ पुष्पित फूलों की सुगन्ध को ले जाने वाली मन्द वायु है और यह वायु इतनी उत्तम है कि यह अपने साथ फूलों का मधु भी वहन करती है। किन्तु वैकुण्ठ के निवासी भगवान् का गुणगान करने में इतनी रुचि रखते हैं कि भगवान् के यश का उच्चारण करते समय वे ऐसी उत्तम वायु द्वारा उत्पन्न व्यवधान को पसन्द नहीं करते। दूसरे शब्दों में, वे शुद्ध भक्त होते हैं। वे भगवान् के महिमागान को अपनी इन्द्रियतृप्ति की अपेक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण समझते हैं। वैकुण्ठलोकों में इन्द्रियतृप्ति का प्रश्न ही नहीं उठता। पुष्पित फूल की सुगन्ध को सूँघना निश्चित रूप से अति उत्तम है, किन्तु यह एकमात्र इन्द्रियतृप्ति के लिए होता है। वैकुण्ठवासी भगवान् की सेवा को सर्वोच्च वरीयता प्रदान करते हैं, अपनी इन्द्रियतृप्ति को नहीं। दिव्य प्रेम में भगवान् की सेवा करने से ऐसा दिव्य आनन्द मिलता है, जिसकी तुलना में इन्द्रियतृप्ति नगण्य मानी जाती है।
 
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