श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 15: ईश्वर के साम्राज्य का वर्णन  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक
लोके तेनाहतालोके लोकपाला हतौजस: ।
न्यवेदयन् विश्वसृजे ध्वान्तव्यतिकरं दिशाम् ॥ २ ॥
 
शब्दार्थ
लोके—इस ब्रह्माण्ड में; तेन—दिति के गर्भधारण के बल पर; आहत—विहीन होकर; आलोके—प्रकाश; लोक-पाला:— विभिन्न लोकों के देवता; हत-ओजस:—जिसका तेज मन्द हो चुका था; न्यवेदयन्—पूछा; विश्व-सृजे—ब्रह्मा से; ध्वान्त व्यतिकरम्—अंधकार का विस्तार; दिशाम्—सारी दिशाओं में ।.
 
अनुवाद
 
 दिति के गर्भधारण करने से सारे लोकों में सूर्य तथा चन्द्रमा का प्रकाश मंद हो गया और विभिन्न लोकों के देवताओं ने उस बल से विचलित होकर ब्रह्माण्ड के स्रष्टा ब्रह्मा से पूछा, “सारी दिशाओं में अंधकार का यह विस्तार कैसा?”
 
तात्पर्य
 श्रीमद्भागवत के इस श्लोक से ऐसा लगता है कि सूर्य ब्रह्माण्ड के सारे लोकों के लिए प्रकाश के स्रोत का कार्य करता है। इस श्लोक से उस आधुनिक वैज्ञानिक सिद्धान्त का समर्थन नहीं होता जिसके अनुसार प्रत्येक ब्रह्माण्ड में अनेक सूर्य होते हैं। ऐसा समझा जाता है कि प्रत्येक ब्रह्माण्ड में केवल एक सूर्य है, जो सारे लोकों के प्रकाश की पूर्ति करता है। भगवद्गीता में चन्द्रमा को भी एक नक्षत्र कहा गया है। नक्षत्र अनेक हैं और जब हम उन्हें रात के समय चमकते देखते हैं, तो हम यह समझ सकते हैं कि वे प्रकाश का परावर्तन करने वाले हैं। जिस तरह चन्द्रमा का प्रकाश सूर्य-प्रकाश का परावर्तन है उसी तरह अन्य लोक भी सूर्यप्रकाश को परावर्तित करते हैं और ऐसे अन्य अनेक लोक हैं, जिन्हें हम अपनी आँखों से नहीं देख सकते। दिति के गर्भ में स्थित पुत्रों के आसुरी प्रभाव से ब्रह्माण्ड भर में अंधकार फैल गया।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥