श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 15: ईश्वर के साम्राज्य का वर्णन  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक
यत्संकुलं हरिपदानतिमात्रद‍ृष्टै-
र्वैदूर्यमारकतहेममयैर्विमानै: ।
येषां बृहत्कटितटा: स्मितशोभिमुख्य:
कृष्णात्मनां न रज आदधुरुत्स्मयाद्यै: ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
यत्—वह वैकुण्ठधाम; सङ्कुलम्—से पूरित; हरि-पद—भगवान् हरि के दोनों चरण कमलों पर; आनति—नमस्कार द्वारा; मात्र—केवल; दृष्टै:—प्राप्त किये जाते हैं; वैदूर्य—वैदूर्य मणि; मारकत—मरकत; हेम—स्वर्ण; मयै:—से निर्मित; विमानै:— विमानों से; येषाम्—उन यात्रियों का; बृहत्—विशाल; कटि-तटा:—कूल्हे; स्मित—हँसते हुए; शोभि—सुन्दर; मुख्य:—मुख- मण्डल; कृष्ण—कृष्ण में; आत्मनाम्—जिनके मन लीन हैं; न—नहीं; रज:—यौन इच्छा; आदधु:—उत्तेजित करती है; उत्स्मय- आद्यै:—घनिष्ठ मित्रवत् व्यवहार, हँसी मजाक द्वारा ।.
 
अनुवाद
 
 वैकुण्ठनिवासी वैदूर्य, मरकत तथा स्वर्ण के बने हुए अपने अपने विमानों में यात्रा करते हैं। यद्यपि वे विशाल नितम्बों तथा सुन्दर हँसीले मुखों वाली अपनी-अपनी प्रेयसियों के साथ सटे रहते हैं, किन्तु वे उनके हँसी मजाक तथा उनके सुन्दर मोहकता से कामोत्तेजित नहीं होते।
 
तात्पर्य
 भौतिक जगत में भौतिकतावादी व्यक्तियों द्वारा अपने कठिन श्रम से ऐश्वर्यों की प्राप्ति की जाती है। कोई तब तक भौतिक सम्पन्नता का भोग नहीं कर सकता जब तक उसे प्राप्त करने के लिए वह कठोर श्रम न करे। किन्तु भगवद्भक्तों को जो वैकुण्ठनिवासी हैं मणियों तथा मरकतों की दिव्य स्थिति को भोगने का अवसर प्राप्त होता है। मणिजटित स्वर्ण के आभूषण कठिन श्रम करने से नहीं, अपितु भगवान् के आशीष से प्राप्त होते हैं। दूसरे शब्दों में, भक्तगण चाहे वैकुण्ठ जगत के हों या इस जगत के, वे कभी दरिद्र नहीं हो सकते, जैसाकि कभी-कभी मान लिया जाता है। उनके पास भोग के लिए पर्याप्त ऐश्वर्य होते हैं, किन्तु उन्हें पाने के लिए उन्हें श्रम नहीं करना पड़ता। यहाँ यह भी कहा गया है कि वैकुण्ठलोक के निवासियों की प्रेयसियाँ इस भौतिक जगत में ही नहीं प्रत्युत उच्च लोकों में जाने वाली प्रेयसियों से भी कई गुना अधिक सुन्दर हैं। यहाँ इसका विशेष उल्लेख हुआ है कि स्त्री के चौड़े नितम्ब अतीव आकर्षक हैं और वे मनुष्य की कामवासना को उत्तेजित करते हैं, किन्तु वैकुण्ठ का अद्भुत गुण यह है कि यद्यपि स्त्रियों के नितम्ब चौड़े हैं और मुखमण्डल सुन्दर हैं और वे मरकत तथा मणियों के आभूषणों से सुसज्जित रहती हैं, फिर भी पुरुषगण कृष्णभावनाभामृत में इस कदर निमग्न रहते हैं कि स्त्रियों के सुन्दर शरीर उन्हें आकृष्ट नहीं कर पाते। दूसरे शब्दों में, स्त्रियों की संगति का आनन्द तो है, किन्तु उनके साथ यौन-सम्बन्ध नहीं होता। वैकुण्ठवासियों में आनन्द का श्रेष्ठतर मानदण्ड होता है, अतएव यौन आनन्द की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥