श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 15: ईश्वर के साम्राज्य का वर्णन  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक
देवा ऊचु:
तम एतद्विभो वेत्थ संविग्ना यद्वयं भृशम् ।
न ह्यव्यक्तं भगवत: कालेनास्पृष्टवर्त्मन: ॥ ३ ॥
 
शब्दार्थ
देवा: ऊचु:—देवताओं ने कहा; तम:—अंधकार; एतत्—यह; विभो—हे महान्; वेत्थ—तुम जानो; संविग्ना:—अत्यन्त चिन्तित; यत्—क्योंकि; वयम्—हम; भृशम्—अत्यधिक; न—नहीं; हि—क्योंकि; अव्यक्तम्—अप्रकट; भगवत:—आपका (भगवान् का); कालेन—काल द्वारा; अस्पृष्ट—अछूता; वर्त्मन:—जिसका मार्ग ।.
 
अनुवाद
 
 भाग्यवान् देवताओं ने कहा : हे महान्, जरा इस अंधकार को तो देखो, जिसे आप अच्छी तरह जानते हैं और जिससे हमें चिन्ता हो रही है। चूँकि काल का प्रभाव आपको छू नहीं सकता, अतएव आपके समक्ष कुछ भी अप्रकट नहीं है।
 
तात्पर्य
 यहाँ पर ब्रह्मा को विभु तथा भगवान् कहा गया है। वे भौतिक जगत में भगवान् के रजोगुणी अवतार हैं। प्रतिनिधि के रूप में वे भगवान् से अभिन्न हैं, अतएव उन पर काल का प्रभाव नहीं पड़ता। काल का प्रभाव भूत, वर्तमान तथा भविष्य के रूप में प्रकट होता है। यह ब्रह्मा तथा अन्य देवताओं जैसे महान् पुरुषों का स्पर्श नहीं कर पाता। कभी कभी देवता तथा महर्षिगण जिन्होंने ऐसी सिद्धि प्राप्त कर ली है त्रिकालज्ञ कहलाते हैं।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥