श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 15: ईश्वर के साम्राज्य का वर्णन  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक
न ह्यन्तरं भगवतीह समस्तकुक्षा-
वात्मानमात्मनि नभो नभसीव धीरा: ।
पश्यन्ति यत्र युवयो: सुरलिङ्गिनो: किं
व्युत्पादितं ह्युदरभेदि भयं यतोऽस्य ॥ ३३ ॥
 
शब्दार्थ
न—नहीं; हि—क्योंकि; अन्तरम्—भेद, अन्तर; भगवति—भगवान् में; इह—यहाँ; समस्त-कुक्षौ—हर वस्तु उदर के भीतर है; आत्मानम्—जीव; आत्मनि—परमात्मा में; नभ:—वायु की अल्प मात्रा; नभसि—सम्पूर्ण वायु के भीतर; इव—सदृश; धीरा:— विद्वान; पश्यन्ति—देखते हैं; यत्र—जिसमें; युवयो:—तुम दोनों का; सुर-लिङ्गिनो:—वैकुण्ठ वासियों की तरह वेश बनाएँ; किम्—कैसे; व्युत्पादितम्—विकसित, जागृत; हि—निश्चय ही; उदर-भेदि—शरीर तथा आत्मा में अन्तर; भयम्—डर; यत:— जहाँ से; अस्य—परमेश्वर का ।.
 
अनुवाद
 
 वैकुण्ठलोक में वहाँ के निवासियों तथा भगवान् में उसी तरह पूर्ण सामञ्जस्य है, जिस तरह अन्तरिक्ष में वृहत् तथा लघु आकाशों में पूर्ण सामञ्जस्य रहता है। तो इस सामञ्जस्य के क्षेत्र में भय का बीज क्यों है? ये दोनों व्यक्ति वैकुण्ठवासियों की तरह वेश धारण किये हैं, किन्तु उनका यह असामञ्जस्य कहाँ से उत्पन्न हुआ?
 
तात्पर्य
 जिस तरह इस भौतिक जगत में हर राज्य में विभिन्न विभाग होते हैं—यथा नागरिक विभाग तथा अपराधी विभाग—उसी तरह ईश्वर की सृष्टि में भी दो विभाग हैं। जिस तरह भौतिक जगत में हम देखते हैं कि अपराध विभाग नागरिक विभाग की अपेक्षा बहुत ही छोटा होता है उसी तरह यह भौतिक जगत, जो कि अपराध विभाग माना जाता है, भगवान् की सम्पूर्ण सृष्टि का एक चतुर्थांश है। सारे जीव जो कि भौतिक ब्रह्माण्डों के निवासी हैं, न्यूनाधिक रूप में अपराधी माने जाते हैं, क्योंकि वे भगवान् के आदेशों का पालन नहीं करना चाहते या ईश्वर की इच्छा वाले सामंजस्यपूर्ण कार्यों के विरुद्ध रहते हैं। सृष्टि का सिद्धान्त यह है कि भगवान् स्वभाव से प्रसन्नचित्त हैं और अपनी दिव्य प्रसन्नता को बढ़ाने के लिए ही वे अनेक बनते हैं। हमारे जैसे जीव, भगवान् के अंश होने के कारण, भगवान् की इन्द्रियों को तुष्ट करने के निमित्त हैं। अत: जब भी उस सामञ्जस्य में कोई विसंगति आती है, तो जीव तुरन्त ही माया की पकड़ में आ जाता है।

भगवान् की बहिरंगा शक्ति भौतिक जगत कहलाती है और भगवान् की अन्तरंगा शक्ति का साम्राज्य वैकुण्ठ या भगवद्धाम कहलाता है। वैकुण्ठलोक में भगवान् तथा उसके निवासियों के मध्य कोई असामञ्जस्य नहीं रहता। अतएव वैकुण्ठ लोक में ईश्वर की सृष्टि पूर्ण है। वहाँ भय का कोई कारण नहीं है। सम्पूर्ण भगवद्धाम एक ऐसी पूर्णतया सामञ्जस्ययुक्त इकाई है कि उसमें शत्रुता की कोई सम्भावना नहीं है। वहाँ की हर वस्तु परम पूर्ण है। जिस तरह शरीर के भीतर बहुत सी शारीरिक संरचनाएँ होती हैं, किन्तु तो भी वे उदर की तुष्टि हेतु एक क्रम में कार्य करती हैं और जिस तरह किसी मशीन में हजारों पुर्जे होते हैं फिर भी मशीन के कार्य को पूरा करने के लिए सामञ्जस्यपूर्वक काम करते हैं उसी तरह वैकुण्ठ लोकों में भगवान् पूर्ण हैं तथा निवासी भी भगवान् की सेवाओं में पूर्णतया संलग्न रहते हैं।

मायावादी दार्शनिक अर्थात् निर्विशेषवादी श्रीमद्भागवत के इस श्लोक की व्याख्या से यह अर्थ लगाते हैं कि छोटा आकाश तथा बृहत् आकाश एक हैं, किन्तु यह भाव युक्तियुक्त नहीं लगता। बृहद् आकाश तथा लघु आकाश का उदाहरण मनुष्य के शरीर के भीतर भी लागू होता है। बृहद् आकाश स्वयं शरीर है और आँतें तथा शरीर के अन्य अंग लघु आकाश में स्थान पाते हैं। शरीर के प्रत्येक अंश का अपना अपना महत्त्व है यद्यपि वे सम्पूर्ण शरीर के लघु अंश में रहते हैं। इसी तरह सम्पूर्ण सृष्टि भगवान् का शरीर है और हम सृजित जीव या सृजित कोई भी वस्तु उस शरीर के केवल लघु अंश हैं। शरीर के अंग कभी भी सम्पूर्ण शरीर के तुल्य नहीं होते। यह कभी भी सम्भव नहीं है। भगवद्गीता में कहा गया है कि सारे जीव जो कि भगवान् के भिन्नांश है शाश्वत तौर पर भिन्नांश रहते हैं। मायावादी दार्शनिकों के अनुसार मोहग्रस्त जीव अपने को भिन्नांश मानता है, यद्यपि वस्तुत: वह परम पूर्ण से तदाकार होता है। यह सिद्धान्त वैध नहीं हैं। सम्पूर्ण तथा अंश का एकत्व (ऐक्य) उनकी गुणता में हैं। आकाश के लघु तथा बृहद् अंशों के एकत्व का यह अर्थ नहीं है कि लघु आकाश बृहद् (महत्) आकाश बन जाता है।

वैकुण्ठलोकों में ‘फूट डालो और राज्य करो’ की राजनीति के लिए कोई अवकाश नहीं है, क्योंकि भगवान् तथा निवासियों के स्वार्थ एक हैं। माया का अर्थ है जीवों तथा भगवान् के बीच असामञ्जस्य और वैकुण्ठ का अर्थ है उनके बीच सामञ्जस्य। वस्तुत: सारे जीवों का पालनपोषण भगवान् द्वारा होता है, क्योंकि वे परम पुरुष हैं। किन्तु मूर्ख प्राणी, वास्तव में परम पुरुष के वश में होते हुए भी, उनके अस्तित्व की अवमानना करते हैं और वह स्थिति माया कहलाती है। कभी कभी वे इस बात से इनकार करते है कि ईश्वर जैसा कोई व्यक्तित्व भी है। उनका कहना है “हर वस्तु शून्य है,” और कभी कभी वे ईश्वर के होने से भिन्न प्रकार से इनकार करते हैं, जैसे “हो सकता है कि ईश्वर हो, किन्तु उनका कोई स्वरूप नहीं है।” ये दोनों धारणाएँ जीव की विद्रोही स्थिति के कारण उत्पन्न होती हैं। जब तक यह विद्रोही अवस्था बनी रहती है तब तक भौतिक जगत में असामञ्जस्य बना रहेगा।

सामञ्जस्य या असामञ्जस्य की अनुभूति किसी विशेष स्थान के कानून तथा व्यवस्था के कारण होती है। धर्म भगवान् का कानून तथा व्यवस्था है। श्रीमद्भगवद्गीता में धर्म का अर्थ भक्तिमय सेवा या कृष्णभावनामृत पाया जाता है। कृष्ण कहते हैं, “सारे धर्मों को त्याग दो और एकमात्र मेरे शरणागत बनो।” यह है धर्म। जब मनुष्य को इसका पूरा-पूरा भान रहता है कि कृष्ण परम भोक्ता तथा परमेश्वर हैं और वह उसी के अनुसार कर्म करता है, तो वही असली धर्म है। जो भी वस्तु इस सिद्धान्त के विरुद्ध जाती है, वह धर्म नहीं है। इसलिए कृष्ण कहते हैं, “अन्य सारे धर्मों को त्याग दो।” आध्यात्मिक जगत में कृष्णभावनामृत का यह धार्मिक सिद्धान्त सामञ्जस्य में बना रहता है, इसीलिए वह लोक वैकुण्ठ कहलाता है। यदि उन्हीं सिद्धान्तों को पूर्णतया या अंशत: यहाँ पर अपनाया जा सके तो यह भी वैकुण्ठ बन जाय। ऐसा किसी संघ या समिति के साथ भी होता है, यथा अन्तर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ। यदि अन्तर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ के सदस्य कृष्ण पर अपनी श्रद्धा केंन्द्रित करते हुए भगवद्गीता के आदेश तथा सिद्धान्तों के अनुसार सामञ्जस्यपूर्वक रहें तब तो वे वैकुण्ठ में रहते हैं, इस भौतिक जगत में नहीं।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥