श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 15: ईश्वर के साम्राज्य का वर्णन  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक
भूयादघोनि भगवद्‍‌भिरकारि दण्डो
यो नौ हरेत सुरहेलनमप्यशेषम् ।
मा वोऽनुतापकलया भगवत्स्मृतिघ्नो
मोहो भवेदिह तु नौ व्रजतोरधोऽध: ॥ ३६ ॥
 
शब्दार्थ
भूयात्—ऐसा ही हो; अघोनि—पापी के लिए; भगवद्भि:—आपके द्वारा; अकारि—किया गया; दण्ड:—दण्ड; य:—जो; नौ—हमारे सम्बन्ध में; हरेत—नष्ट करे; सुर-हेलनम्—महान् देवताओं की आज्ञा का उल्लंघन करते हुए; अपि—निश्चय ही; अशेषम्—असीम; मा—नहीं; व:—तुम्हारा; अनुताप—पछतावा; कलया—थोड़ा थोड़ा करके; भगवत्—भगवान् का; स्मृति घ्न:—स्मरण शक्ति का विनाश करते हुए; मोह:—मोह; भवेत्—हो; इह—मूर्ख जीवयोनि में; तु—लेकिन; नौ—हम दोनों का; व्रजतो:—जा रहे; अध: अध:—नीचे भौतिक जगत को ।.
 
अनुवाद
 
 मुनियों द्वारा शापित होने के बाद द्वारपालों ने कहा : यह ठीक ही हुआ कि आपने हमें आप जैसे मुनियों का अनादर करने के लिए दण्ड दिया है। किन्तु हमारी प्रार्थना है कि हमारे पछतावे पर आपकी दया के कारण हमें उस समय भगवान् की विस्मृति का मोह न आए जब हम नीचे नीचे जा रहे हों।
 
तात्पर्य
 दण्ड कितना ही कठोर क्यों न हो भक्त को सहन है, किन्तु भगवान् की विस्मृति कराने वाला दण्ड सहन नहीं होता। द्वारपाल, जो स्वयं भी भक्त थे, समझ गये कि उन्हें कौन सा दण्ड दिया जाने वाला है, क्योंकि उन्होंने मुनियों को वैकुण्ठलोक में प्रविष्ट न होने देकर जो महान् अपराध किया था उससे वे सचेष्ट थे। निम्नतम जीव योनियों में जिनमें पशुयोनि भी सम्मिलित हैं, ईश्वर की विस्मृति प्रमुख है। द्वारपाल इससे अवगत थे कि वे भौतिक जगत के अपराध विभाग में जा रहे हैं और उन्हें आशंका थी कि वे निम्नतम योनि में डाले जा सकते हैं जिससे वे परमेश्वर को भूल जाँय। इसलिए उन्होंने प्रार्थना की कि शाप के कारण उन्हें जो जीवन मिलने जा रहा है उसमें ऐसा घटित न हो। भगवद्गीता (१६.१९, २०) में कहा गया है कि जो लोग भगवान् तथा उनके भक्तों से ईर्ष्या करते हैं, वे जीवन की अतीव गर्हित योनियों में डाल दिये जाते हैं; ऐसे मूर्ख जन्म-जन्मांतर भगवान् का स्मरण नहीं कर पाते और इस तरह वे अधोगति को प्राप्त होते रहते हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥