श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 15: ईश्वर के साम्राज्य का वर्णन  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक
एवं तदैव भगवानरविन्दनाभ:
स्वानां विबुध्य सदतिक्रममार्यहृद्य: ।
तस्मिन् ययौ परमहंसमहामुनीना-
मन्वेषणीयचरणौ चलयन् सहश्री: ॥ ३७ ॥
 
शब्दार्थ
एवम्—इस प्रकार; तदा एव—उसी क्षण; भगवान्—भगवान्; अरविन्द-नाभ:—जिसकी नाभि से कमल निकला है; स्वानाम्—अपने दासों के विषय में; विबुध्य—जानकर; सत्—मुनियों को; अतिक्रमम्—अपमान; आर्य—सदाचारियों की; हृद्य:—प्रसन्नता; तस्मिन्—वहाँ; ययौ—गये; परमहंस—परमहंस; महा-मुनीनाम्—महामुनियों द्वारा; अन्वेषणीय—जो खोजे जाने योग्य हैं; चरणौ—चरणकमल; चलयन्—विचरण करते हुए; सह-श्री:—लक्ष्मीजी सहित ।.
 
अनुवाद
 
 नाभि से उगे कमल के कारण पद्मनाभ कहलाने वाले तथा सदाचारियों की प्रसन्नता के रूप भगवान् को उन सन्तों के प्रति अपने ही दासों के द्वारा किये गये अपमान का उसी क्षण पता चल गया। वे अपनी प्रेयसी लक्ष्मी सहित उस स्थान पर उन चरणों से चलकर गये जिनकी खोज संन्यासी तथा महामुनि करते हैं।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता में भगवान् जोर देकर घोषणा करते हैं कि उनके भक्त कभी भी विनष्ट नहीं हो सकते। भगवान् समझ गये कि द्वारपालों तथा मुनियों के बीच का झगड़ा एक नया मोड़ ले रहा है, अतएव वे तुरन्त अपने धाम से निकल आये और झगड़े को आगे बढऩे से रोकने के लिए उस स्थान पर गये जिससे उनके भक्त द्वारपाल सदा सदा के लिए विनष्ट न हों।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥