श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 15: ईश्वर के साम्राज्य का वर्णन  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक
पीतांशुके पृथुनितम्बिनि विस्फुरन्त्या
काञ्‍च्यालिभिर्विरुतया वनमालया च ।
वल्गुप्रकोष्ठवलयं विनतासुतांसे
विन्यस्तहस्तमितरेण धुनानमब्जम् ॥ ४० ॥
 
शब्दार्थ
पीत-अंशुके—पीले वस्त्र से ढका; पृथु-नितम्बिनि—अपने विशाल कूल्हों पर; विस्फुरन्त्या—चमचमाती; काञ्च्या—करधनी से; अलिभि:—भौरों द्वारा; विरुतया—गुंजार करती; वन-मालया—ताजे फूलों की माला से; च—तथा; वल्गु—सुन्दर; प्रकोष्ठ—कलाइयाँ; वलयम्—कंगन; विनता-सुत—विनता पुत्र गरुड़ के; अंसे—कन्धे पर; विन्यस्त—टिकाये; हस्तम्—एक हाथ; इतरेण—दूसरे हाथ से; धुनानम्—घुमाते हुए; अब्जम्—कमल का फूल ।.
 
अनुवाद
 
 वे करधनी से अलंकृत थे, जो उनके विशाल कूल्हों को आवृत्त किये हुए पीत वस्त्र पर चमचमा रही थी। वे ताजे फूलों की माला पहने थे, जो गुंजरित भौरों से लक्षित थी। उनकी सुन्दर कलाइयों पर कंगन सुशोभित थे और वे अपना एक हाथ अपने वाहन गरुड़ के कन्धे पर रखे थे तथा दूसरे हाथ से कमल का फूल घुमा रहे थे।
 
तात्पर्य
 यहाँ पर मुनियों द्वारा स्वयं अनुभव किया गया भगवान् का पूर्ण विवरण है, भगवान् का शरीर पीले वस्त्रों से आच्छादित था और उनकी कमर पतली थी। वैकुण्ठ में जब भी भगवान् के या उनके किसी पार्षद के वक्षस्थल पर फूल की माला पड़ी हुई होती है, तो यह वर्णन रहता है कि उस पर भौंरे गुंजार कर रहे हैं। ये सारे स्वरूप अत्यन्त सुन्दर तथा भक्तों को आकृष्ट करने वाले थे। भगवान् का एक हाथ उनके वाहन गरुड़ पर था और दूसरे हाथ में वे एक कमल का फूल घुमा रहे थे। ये भगवान् नारायण के वैयक्तिक गुण हैं।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥