श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 15: ईश्वर के साम्राज्य का वर्णन  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक
ते वा अमुष्य वदनासितपद्मकोश-
मुद्वीक्ष्य सुन्दरतराधरकुन्दहासम् ।
लब्धाशिष: पुनरवेक्ष्य तदीयमङ्‌घ्रि-
द्वन्द्वं नखारुणमणिश्रयणं निदध्यु: ॥ ४४ ॥
 
शब्दार्थ
ते—वे मुनि; वै—निश्चय ही; अमुष्य—भगवान् का; वदन—मुख; असित—नीला; पद्म—कमल का; कोशम्—भीतरी भाग; उद्वीक्ष्य—ऊपर देखकर; सुन्दर-तर—अधिक सुन्दर; अधर—होठ; कुन्द—चमेली का फूल; हासम्—हँसी; लब्ध—प्राप्त किया; आशिष:—जीवन के लक्ष्य; पुन:—फिर; अवेक्ष्य—नीचे देखकर; तदीयम्—उसका; अङ्घ्रि-द्वन्द्वम्—चरणकमलों की जोड़ी; नख—नाखून; अरुण—लाल; मणि—पन्ना; श्रयणम्—आश्रय; निदध्यु:—ध्यान किया ।.
 
अनुवाद
 
 उन्हें भगवान् का सुन्दर मुख नीले कमल के भीतरी भाग जैसा प्रतीत हुआ और भगवान् की मुसकान खिले हुए चमेली के फूल सी प्रतीत हुई। मुनिगण भगवान् का मुख देखकर पूर्णतया सन्तुष्ट थे और जब उन्होंने उनको अधिक देखना चाहा तो उन्होंने उनके चरणकमलों के नाखूनों को देखा जो पन्ना जैसे थे। इस तरह वे भगवान् के शरीर को बारम्बार निहार रहे थे, अत: उन्होंने अन्त में भगवान् के साकार रूप का ध्यान किया।
 
 
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥