श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 15: ईश्वर के साम्राज्य का वर्णन  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक
पुंसां गतिं मृगयतामिह योगमार्गै-
र्ध्यानास्पदं बहु मतं नयनाभिरामम् ।
पौंस्‍नं वपुर्दर्शयानमनन्यसिद्धै-
रौत्पत्तिकै: समगृणन् युतमष्टभोगै: ॥ ४५ ॥
 
शब्दार्थ
पुंसाम्—उन पुरुषों की; गतिम्—मुक्ति; मृगयताम्—ढूँढ रहे; इह—इस जगत में; योग-मार्गै:—अष्टांग योग विधि के द्वारा; ध्यान-आस्पदम्—ध्यान का विषय; बहु—महान् योगियों द्वारा; मतम्—संस्तुत; नयन—नेत्र; अभिरामम्—सुहावने; पौंस्नम्— मानव; वपु:—रूप; दर्शयानम्—प्रदर्शित करते हुए; अनन्य—अन्यों द्वारा नहीं; सिद्धै:—सिद्ध; औत्पत्तिकै:—शाश्वत उपस्थित; समगृणन्—प्रशंसित; युतम्—भगवान्, जो समन्वित है; अष्ट-भोगै:—आठ प्रकार की सिद्धियों से ।.
 
अनुवाद
 
 यही भगवान् का वह रूप है, जिसका ध्यान योगविधि के अनुयायी करते हैं और ध्यान में यह योगियों को मनोहर लगता है। यह काल्पनिक नहीं, अपितु वास्तविक है जैसा कि महान् योगियों ने सिद्ध किया है। भगवान् आठ प्रकार की सिद्धियों से पूर्ण हैं, किन्तु अन्यों के लिए ये पूर्णरूप में सम्भव नहीं हैं।
 
तात्पर्य
 यहाँ पर योगविधि की सफलता का अति सुन्दर ढंग से वर्णन हुआ है। यह विशेष उल्लेख है कि चतुर्भुजी नारायण के रूप में भगवान् का रूप योगमार्ग के अनुयायियों के लिए ध्यान का लक्ष्य है। आधुनिक युग में ऐसे अनेक तथाकथित योगी हैं, जो चतुर्भुजी नारायण रूप को अपने ध्यान का लक्ष्य नहीं बनाते। उनमें से कुछ तो किसी निर्विशेष या शून्य का ध्यान करने का प्रयास करते हैं, किन्तु यह उन महान् योगियों द्वारा अनुमोदित नहीं है, जो आदर्श विधि का पालन करते हैं। असली योगमार्ग विधि तो इन्द्रियों को वश में करना, एकान्त तथा पवित्र स्थान में बैठना और नारायण के उस चतुर्भुजी रूप का ध्यान करना है, जो इस अध्याय में वर्णित विधि से अलंकृत रहता है और जिस रूप में वे चारों मुनियों के समक्ष प्रकट हुए थे। यह नारायण रूप कृष्ण का अंश है, अतएव कृष्णभावनामृत आन्दोलन, जो अब विस्तार पा रहा है, योगाभ्यास की असली सर्वोच्च विधि है।

कृष्णभावनामृत तो प्रशिक्षित भक्तिमय योगियों द्वारा सर्वोच्च योग का निष्पादन है। योगाभ्यास के सारे आकर्षणों के बावजूद आठ प्रकार की योग सिद्धियाँ सामान्य व्यक्ति को नहीं प्राप्त हो पाती हैं। किन्तु यहाँ यह वर्णन किया गया है कि चारों मुनियों के समक्ष प्रकट होने वाले भगवान् स्वयं सभी आठ सिद्धियों से पूर्ण हैं। सर्वोच्च योग मार्ग विधि चौबीसों घण्टे कृष्ण पर मन को केन्द्रित करना है। यह कृष्णभावनामृत कहलाती है। श्रीमद्भागवत तथा भगवद्गीता में वर्णित योग पद्धति या पतञ्जलि द्वारा संस्तुत योग पद्धति आजकल अभ्यास किये जाने वाले हठयोग से भिन्न है जैसाकि आजकल पाश्चात्य देशों में समझा जाता है। असली योगाभ्यास तो इन्द्रियों को वश में करना है और ऐसा वशीकरण हो जाने के पश्चात् मन को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण के नारायण रूप में एकाग्र करना है। भगवान् कृष्ण आदि भगवान् हैं और अन्य सारे विष्णु रूप, जिनमें उन्हें शंख, चक्र, गदा तथा पद्म से सजे हुए उनका वर्णन किया गया है कृष्ण के स्वांश हैं। भगवद्गीता में भगवान् के स्वरूप का ध्यान करने की संस्तुति की गई है। मन की एकाग्रता का अभ्यास करने के लिए मनुष्य को सिर तथा पीठ को सीधी रेखा में रखते हुए बैठना होता है और पवित्र वातावरण द्वारा शुद्ध किये हुए एकान्त स्थान में अभ्यास करना होता है। योगी को ब्रह्मचर्य के विधि-विधानों का पालन करना होता है, अर्थात् आत्मसंयम तथा कौमार्यपूर्ण जीवन बिताने का दृढ़ प्रयास करना होता है। किसी घनी आबादी वाले शहर में, अपव्ययी जीवन बिताते हुए, और अनियंत्रित यौन तथा जीभ के व्यभिचार में लगे रहकर, कोई योगाभ्यास नहीं कर सकता। योगाभ्यास के लिए इन्द्रियों का नियंत्रण आवश्यक है और इन्द्रिय नियंत्रण का शुभारम्भ जीभ को नियंत्रित करने से होता है। जो व्यक्ति जीभ पर नियंत्रण रख सकता है, वह अन्य इन्द्रियों पर भी नियंत्रण कर सकता है। मनुष्य अपनी जीभ को सभी प्रकार के वर्जित भोज्य तथा पेय पदार्थों को ग्रहण करने की अनुमति देकर उसी के साथ योगाभ्यास में प्रगति नहीं कर सकता।

यह अत्यन्त शोचनीय बात है कि अनेक अवैध तथाकथित योगी पाश्चात्य देशों में आते हैं और लोगों की योगाभ्यास के प्रति उन्मुखता का अवांछनीय लाभ उठाते हैं। ऐसे अवैध योगी सार्वजनिक रूप से यह घोषित करने का दुस्साहस तक करते हैं कि मनुष्य सुरा-पान की आदत में लिप्त रहते हुए भी ध्यान का अभ्यास कर सकता है।

पाँच हजार वर्ष पूर्व भगवान् कृष्ण ने अर्जुन के लिए योगाभ्यास की संस्तुति की थी, किन्तु अर्जुन ने स्पष्ट रूप से योग पद्धति के कठोर यम-नियमों का पालन करने में अपनी असमर्थता व्यक्त की थी। मनुष्य को कर्म के हर क्षेत्र में अत्यन्त व्यावहारिक होना चाहिए और उसे योग के नाम पर व्यर्थ के योगासनों का अभ्यास करने में अपना बहुमूल्य समय नहीं गँवाना चाहिए। असली योग तो अपने हृदय के भीतर चतुर्भुजी परमात्मा को खोजना तथा ध्यान में उनका निरन्तर दर्शन करना है। ऐसा निरन्तर ध्यान समाधि कहलाता है और इस ध्यान का लक्ष्य तो अलंकृत शरीर वाला चतुर्भुजी नारायण होता है जैसाकि श्रीमद्भागवत के इस अध्याय में वर्णन हुआ है। किन्तु यदि कोई शून्य या निर्विशेष वस्तु का ध्यान करना चाहता है, तो योगाभ्यास में सफलता प्राप्त करने में काफी समय लगता है। हम अपने मन को किसी शून्य या निर्विशेषवादी वस्तु पर एकाग्र नहीं कर सकते। असली योग तो भगवान् के चतुर्भुजी नारायण रूप पर मन को स्थिर करना है, जो हर व्यक्ति के हृदय में आसीन हैं।

ध्यान के द्वारा मनुष्य यह समझ सकता है कि ईश्वर प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में आसीन हैं। यदि कोई इसे न भी जानता हो तो भी ईश्वर हर एक के हृदय में स्थित रहते हैं। वे न केवल मनुष्य के हृदय में स्थित रहते हैं, अपितु वे कुत्ते-बिल्लियों के हृदयों के भीतर भी स्थित हैं। भगवद्गीता इस तथ्य को भगवान् की इस घोषणा द्वारा प्रमाणित करती है—ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशे। जगत के परम नियन्ता ईश्वर हर एक के हृदय में आसीन हैं। वे न केवल हर एक के हृदय में रहते हैं, अपितु वे परमाणु तक के भीतर उपस्थित हैं। ईश्वर की उपस्थिति से कोई भी स्थान शून्य या रहित नहीं है। यह ईशोपनिषद् का कथन है। ईश्वर सर्वत्र उपस्थित हैं और उनके स्वामित्व का अधिकार हर वस्तु पर लागू होता है। भगवान् जिस स्वरूप में सर्वत्र उपस्थित रहते हैं वह परमात्मा कहलाता है। आत्मा का अर्थ है व्यष्टि आत्मा और परमात्मा का अर्थ है व्यष्टि परमात्मा। आत्मा तथा परमात्मा दोनों ही व्यष्टि पुरुष हैं। आत्मा तथा परमात्मा में यही अन्तर है कि आत्मा किसी विशेष शरीर में ही उपस्थित रहता है, जबकि परमात्मा सर्वत्र उपस्थित रहता है। इस सन्दर्भ में सूर्य का दृष्टान्त अति उत्तम है। कोई व्यष्टि व्यक्ति किसी एक स्थान पर स्थित रहता है, किन्तु सूर्य इसी प्रकार की व्यष्टि सत्ता होते हुए भी हर व्यक्ति के सिर के ऊपर उपस्थित रहता है। इसकी व्याख्या भगवद्गीता में की गई है। इसलिए यद्यपि सारे जीवों के, जिनमें भगवान् भी सम्मिलित हैं, गुण समान हैं, तो भी परमात्मा अपने विस्तार करने की मात्रा युक्त शक्ति के कारण व्यष्टि आत्मा से भिन्न हैं। भगवान् या परमात्मा अपना विस्तार लाखों रूपों में कर सकते हैं, किन्तु व्यष्टि आत्मा ऐसा नहीं कर सकता।

हर एक के हृदय में स्थित होने से परमात्मा हर एक के कार्यों का अवलोकन कर सकता है—चाहे वह भूत, वर्तमान अथवा भविष्य हो। उपनिषदों में परमात्मा को व्यष्टि आत्मा के साथ मित्र तथा साक्षी रूप में आसीन बतलाया गया है। मित्र रूप में भगवान् अपने मित्र व्यष्टि आत्मा को पा लेने तथा उसे भगवद्धाम वापस ले जाने के लिए उत्सुक रहते हैं। साक्षी के रूप में वे सारे वरों के प्रदाता हैं और वे प्रत्येक व्यष्टि आत्मा को उसके कर्मों का फल देते हैं। परमात्मा हर व्यष्टि आत्मा को वे सारी सुविधाएँ प्रदान करते हैं, जिन्हें इस भौतिक जगत में वह भोगना चाहता है। दुख तो भौतिक जगत पर प्रभुत्व जताने की जीव की लालसा का प्रतिफल होता है। किन्तु भगवान् अपने मित्र व्यष्टि आत्मा को, जो कि उसका पुत्र भी है, अन्य सारे कार्यों को त्याग कर नित्य आनन्दमय तथा ज्ञानमय जीवन के लिए उनकी शरण में जाने का आदेश देते हैं। सभी प्रकार के योग पर अत्यन्त प्रामाणिक तथा सर्वाधिक पढ़ी जानेवाली पुस्तक भगवद्गीता की यह अन्तिम शिक्षा है। इस तरह भगवद्गीता का अन्तिम शब्द योग की सिद्धि में अन्तिम शब्द है।

भगवद्गीता में कहा गया है कि जो व्यक्ति सदैव कृष्णभावनामृत में लीन रहता है, वह सर्वोच्च योगी है। कृष्णभावनामृत क्या है? जिस तरह व्यष्टि आत्मा अपनी चेतना के द्वारा उसके सारे शरीर में उपस्थित रहता है उसी तरह अतिचेतना द्वारा परमात्मा सारी सृष्टि में उपस्थित रहते हैं। यह अतिचेतना शक्ति व्यष्टि आत्मा द्वारा जिस की चेतना सीमित है, नकल की जाती है। मैं यह तो समझ सकता हूँ कि मेरे सीमित शरीर में क्या हो रहा है, किन्तु मैं इसका अनुभव नहीं कर सकता कि दूसरे के शरीर में क्या हो रहा है। मैं अपनी चेतना के द्वारा अपने सारे शरीर में उपस्थित हूँ, लेकिन मेरी चेतना अन्य के शरीर में उपस्थित नहीं है। किन्तु परमात्मा सर्वत्र तथा सबों के भीतर उपस्थित होने से हर व्यक्ति के शरीर के विषय में भी सचेत रहते हैं। यह सिद्धान्त कि आत्मा तथा परमात्मा एक हैं स्वीकार्य नहीं है, क्योंकि इसकी पुष्टि प्रामाणिक वैदिक वाङ्मय से नहीं होती। व्यष्टि आत्मा की चेतना अतिचेतना में कार्य नहीं कर सकती। किन्तु यह अतिचेतना ब्रह्म की चेतना के साथ व्यष्टि चेतना को जोडक़र प्राप्त की जा सकती है। यह जुडऩे की प्रक्रिया, शरणागति या कृष्णभावनामृत कहलाती है। भगवद्गीता की शिक्षाओं से यह स्पष्ट है कि अर्जुन प्रारम्भ में अपने भाइयों तथा सम्बन्धियों से युद्ध नहीं करना चाहता था, किन्तु भगवद्गीता समझ लेने पर उसने अपनी चेतना को कृष्ण की अतिचेतना से संयुक्त कर दिया। तब वह कृष्णभावनामृत में था।

पूर्ण कृष्णभावनाभावित व्यक्ति कृष्ण के आदेश से कर्म करता है। कृष्णभावनामृत की शुरुआत में गुरु के पारदर्शी माध्यम से आदेश प्राप्त किया जाता है। जब कोई व्यक्ति पर्याप्त प्रशिक्षित हो लेता है और कृष्ण के प्रति विनीत श्रद्धा तथा प्रेम से प्रामाणिक गुरु के निर्देशन में कार्य करता है, तो संयुक्त होने की विधि अधिक दृढ तथा सही बन जाती है। कृष्णभावनामृत में भक्ति की यह अवस्था योग प्रणाली की सबसे पूर्ण अवस्था है। इस अवस्था में कृष्ण या परमात्मा भीतर से आदेश देते हैं जबकि बाहर से भक्त की सहायता गुरु द्वारा की जाती है, जो कृष्ण का प्रामाणिक प्रतिनिधि होता है। भीतर से परमात्मा चैत्य के रूप में भक्त की सहायता करते हैं, क्योंकि वे प्रत्येक के हृदय के भीतर आसीन रहते हैं। किन्तु केवल इतना समझना कि ईश्वर सबके हृदय में आसीन हैं पर्याप्त नहीं है। मनुष्य को भीतर तथा बाहर दोनों तरह से ईश्वर से परिचित होना होता है और कृष्णभावनामृत में कर्म करने के लिए उसे भीतर तथा बाहर से आदेश प्राप्त करना चाहिए। यही मनुष्य-जीवन की सर्वोच्च सिद्धावस्था तथा समस्त योग की सर्वोच्च सिद्धि है।

पूर्ण योगी के लिए आठ प्रकार की चरम सिद्धियाँ हैं—वायु से भी हल्का, परमाणु से भी छोटा, पर्वत से भी बड़ा, जो भी इच्छा करे उसे पा सकना, ईश्वर की तरह नियंत्रण करना इत्यादि—किन्तु जब वह भगवान् से आदेश पाने की सिद्धावस्था तक पहुँच जाता है, तो वह उपर्युक्त भौतिक उपलब्धियों की किसी भी अवस्था से बढक़र होता है। योग प्रणाली का प्राणायाम, जिसका सामान्य तौर पर अभ्यास किया जाता है, मात्र शुरुआत है। परमात्मा का ध्यान अगला कदम है। किन्तु परमात्मा से सीधा सम्पर्क प्राप्त करना और उनसे आदेश लेना सर्वोच्च सिद्धि की अवस्था है। ध्यान की प्राणायाम विधि पाँच हजार वर्ष पूर्व भी अति कठिन थी अन्यथा अर्जुन ने इस प्रणाली को अपनाने के कृष्ण के प्रस्ताव को अस्वीकार न किया होता। यह कलियुग पतित युग कहलाता है। इस युग में लोग सामान्यतया अल्पायु तथा आत्म-साक्षात्कार या आध्यात्मिक जीवन को समझने में अत्यन्त मन्द होते हैं, वे प्राय: अभागे होते हैं, अत: यदि कोई आत्म-साक्षात्कार में तनिक भी रुचि रखता है, तो वह कई षड््यंत्रों द्वारा गुमराह किया जा सकता है। योग की पूर्ण अवस्था प्राप्त करने का एकमात्र साधन भगवद्गीता के सिद्धान्तों का पालन करना है, जिसका अभ्यास श्री चैतन्य महाप्रभु ने किया। यह योगाभ्यास की सरलतम तथा सर्वोच्च सिद्धि है। श्री चैतन्य महाप्रभु ने इस कृष्णभावनामृत योग प्रणाली का प्रदर्शन व्यावहारिक रूप में कृष्ण के पवित्र नाम का केवल कीर्तन करके किया जैसी कि वेदान्त, श्रीमद्भागवत, भगवद्गीता तथा कई महत्त्वपूर्ण पुराणों में संस्तुति की गई है।

भारतीय सबसे अधिक संख्या में इसी योग विधि का पालन करते हैं और यह धीरे धीरे संयुक्त राज्य के अनेक शहरों में फैल रही है। यह इस युग के लिए अतीव सरल तथा व्यावहारिक है, विशेष रूप से उनके लिए जो योग में सफलता के प्रति गम्भीर हैं। इस युग में कोई अन्य विधि सफल नहीं हो सकती। ध्यान की विधि स्वर्णयुग या सत्ययुग में सम्भव थी, क्योंकि उस युग के लोग लाखों वर्षों तक जीवित रहते थे। जो व्यक्ति व्यावहारिक योगाभ्यास में सफलता चाहता है उसे सलाह दी जाती है कि वह हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे; हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे का कीर्तन करे और तब उसे स्वयं अनुभव होने लगेगा कि वह प्रगति कर रहा है। भगवद्गीता में कृष्णभावनामृत का यह अभ्यास राजविद्या कहलाता है।

जिन्होंने भक्तियोग की इस सर्वाधिक उदात्त विधि को अपनाया है और जो कृष्ण के दिव्य प्रेम में भक्ति का अभ्यास करते हैं, वे इसकी सुखमय तथा सरल सम्पन्नता को प्रमाणित कर सकते हैं। सनक, सनातन, सनन्दन तथा सनत्कुमार नामक चारों मुनि भी भगवान् के स्वरूप एवं उनके चरणकमलों की धूल की दिव्य सुगन्ध के प्रति आकृष्ट हो गये, जैसाकि श्लोक ४३ में बतलाया जा चुका है।

योग के लिए इन्द्रियों का नियंत्रण आवश्यक है तथा भक्तियोग या कृष्णभावनामृत इन्द्रियों को शुद्ध करने की विधि है। जब इन्द्रियाँ शुद्ध हो जाती हैं, तो वे स्वत: नियंत्रित हो जाती हैं। कृत्रिम साधनों से इन्द्रियों के कार्यों को नहीं रोका जा सकता, किन्तु यदि कोई इन्द्रियों को भगवान् की सेवा में लगाकर शुद्ध कर ले तो इन्द्रियाँ न केवल रद्दी कार्य से नियंत्रित की जा सकती है, अपितु उन्हें भगवान् की दिव्य सेवा में लगाया जा सकता है, जैसाकि चारों मुनियों—सनक, सनातन, सनन्दन तथा सनत्कुमार ने कामना की थी। इसलिए कृष्णभावनामृत चिन्तनशील मन द्वारा बनाई गई धारणा नहीं है। इस विधि का आदेश भगवद्गीता (९.३४) में हुआ है—मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥