श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 15: ईश्वर के साम्राज्य का वर्णन  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक
नात्यन्तिकं विगणयन्त्यपि ते प्रसादं
किम्वन्यदर्पितभयं भ्रुव उन्नयैस्ते ।
येऽङ्ग त्वदङ्‌घ्रि शरणा भवत: कथाया:
कीर्तन्यतीर्थयशस: कुशला रसज्ञा: ॥ ४८ ॥
 
शब्दार्थ
न—नहीं; आत्यन्तिकम्—मुक्ति; विगणयन्ति—परवाह करते हैं; अपि—भी; ते—वे; प्रसादम्—वर; किम् उ—क्या कहा जाय; अन्यत्—अन्य भौतिक सुख; अर्पित—दिया गया; भयम्—भय; भ्रुव:—भौंहों का; उन्नयै:—उठाने से; ते—तुम्हारे; ये—वे भक्त; अङ्ग—हे भगवान्; त्वत्—तुम्हारे; अङ्घ्रि—चरणकमल; शरणा:—शरण लिये हुए; भवत:—आपकी; कथाया:— कथाएँ; कीर्तन्य—कीर्तन के योग्य; तीर्थ—शुद्ध; यशस:—यश; कुशला:—अत्यन्त पटु; रस-ज्ञा:—रस के ज्ञाता ।.
 
अनुवाद
 
 वे व्यक्ति जो वस्तुओं को यथारूप में समझने में अत्यन्त पटु और सर्वाधिक बुद्धिमान हैं अपने को भगवान् के शुभ कार्यों तथा उनकी लीलाओं की कथाओं को सुनने में लगाते हैं, जो कीर्तन तथा श्रवण के योग्य होती हैं। ऐसे व्यक्ति सर्वोच्च भौतिक वर की, अर्थात् मुक्ति की भी परवाह नहीं करते, स्वर्गलोक के भौतिक सुख जैसे कम महत्वपूर्ण वरों के विषय में तो कुछ कहना ही नहीं।
 
तात्पर्य
 भगवद्भक्तों द्वारा जिस दिव्य आनन्द का भोग किया जाता है, वह अल्पज्ञों द्वारा भोगे गये भौतिक सुख से सर्वथा भिन्न है। भौतिक जगत में अल्पज्ञ लोग वरों के चार सिद्धान्तों में लगे रहते हैं, जो धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष कहलाते हैं। सामान्तया वे किसी भौतिक वर को प्राप्त करने के लिए धार्मिक जीवन अपनाते हैं जिसका उद्देश्य इन्द्रियों तो तुष्ट करना है। जब वे इस विधि से अधिकतम इन्द्रिय भोग की पूर्ति करने में हताश अथवा भ्रान्त हो जाते हैं, तो वे परम तत्त्व से तदाकार होना चाहते हैं, जो उनके विचार से मुक्ति है। मुक्ति पाँच प्रकार की है जिनमें सबसे कम महत्त्वपूर्ण सायुज्य या ब्रह्म से तदाकार होना है। भक्तगण ऐसी मुक्ति की परवाह नहीं करते, क्योंकि वे वास्तव में बुद्धिमान होते हैं। न ही वे अन्य चार प्रकार की मुक्तियों में से किसी की भी कामना करते हैं—ये हैं भगवान् के ही लोक में निवास करना (सालोक्य), संगी के रूप में भगवान् के साथ साथ रहना (सामीप्य), उनके जैसा ही ऐश्वर्य पाना (सार्ष्टि) तथा वैसा ही शारीरिक रूप प्राप्त करना। (सारूप्य) वे तो एकमात्र भगवान् की तथा उनके शुभ कार्यों की महिमा का गुणगान करना चाहते हैं। शुद्ध भक्ति तो श्रवणं कीर्तनम् है। भगवान् की महिमा के श्रवण तथा कीर्तन में दिव्य आनन्द लेने वाले शुद्ध भक्त किसी प्रकार की मुक्ति की परवाह नहीं करते। यदि उन्हें पाँचों मुक्तियाँ भी प्रदान की जाँय वे उन्हें अस्वीकार कर देते हैं जैसाकि भागवत के तृतीय स्कन्ध में बतलाया गया है। भौतिकतावादी लोग स्वर्गलोक में स्वर्गिक सुख के इन्द्रिय-भोग की आकांक्षा करते हैं, किन्तु भक्तगण ऐसे भौतिक आनन्द का तुरन्त तिरस्कार कर देते हैं। भक्त इन्द्र के पद तक की परवाह नहीं करता। भक्त जानता है कि कोई भी आनन्दप्रद भौतिक पद कभी न कभी विनष्ट हो जायेगा। यदि वह इन्द्र, चन्द्र या किसी अन्य देवता के पद तक पहुँच भी जाता है, तो एक अवस्था ऐसी आयेगी जब वह विनष्ट हो जायेगा। भक्त कभी भी ऐसे क्षणिक आनन्द में रुचि नहीं दिखाता। वैदिक शास्त्रों से यह समझा जाता है कि कभी न कभी ब्रह्मा तथा इन्द्र तक नीचे गिरते हैं, किन्तु दिव्य भगवद्धाम से भक्त कभी नीचे नहीं गिरता। जीवन की इस दिव्य अवस्था की, जिसमें मनुष्य भगवान् की लीलाओं को सुनने में दिव्य आनन्द का अनुभव करता है, श्री चैतन्य महाप्रभु ने भी संस्तुति की है। जब श्री चैतन्य महाप्रभु रामानन्द राय से बातें कर रहे थे तो आध्यात्मिक साक्षात्कार के विषय में रामानन्द ने तरह तरह के सुझाव रखे थे, किन्तु श्री चैतन्य महाप्रभु ने इस एक सुझाव के अतिरिक्त सबों को निरस्त कर दिया था कि मनुष्य को शुद्ध भक्तों की संगति में भगवान् की महिमाओं का श्रवण करना चाहिए। वह सबों को स्वीकार्य है, विशेष रूप से इस युग में। मनुष्य को चाहिए कि शुद्ध भक्तों से भगवान् के कार्यकलापों के विषय में सुनने में अपने को लगाये। मानव जाति के लिए यह सर्वोच्च वरदान माना जाता है।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥