श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 15: ईश्वर के साम्राज्य का वर्णन  »  श्लोक 49
 
 
श्लोक
कामं भव: स्ववृजिनैर्निरयेषु न: स्ता-
च्चेतोऽलिवद्यदि नु ते पदयो रमेत ।
वाचश्च नस्तुलसिवद्यदि तेऽङ्‌घ्रि शोभा:
पूर्येत ते गुणगणैर्यदि कर्णरन्ध्र: ॥ ४९ ॥
 
शब्दार्थ
कामम्—वांछित; भव:—जन्म; स्व-वृजिनै:—अपने ही पाप कर्मों से; निरयेषु—निम्न जन्मों में; न:—हमारा; स्तात्—ऐसा ही हो; चेत:—मन; अलि-वत्—भौंरे सदृश; यदि—यदि; नु—हो सकता है; ते—तुम्हारे; पदयो:—चरणकमलों पर; रमेत—लगे रहते हैं; वाच:—शब्द; च—तथा; न:—हमारे; तुलसि-वत्—तुलसी दल के समान; यदि—यदि; ते—तुम्हारे; अङ्घ्रि— चरणकमलों पर; शोभा:—सजाये गये; पूर्येत—पूरित हो जाते हैं; ते—तुम्हारे; गुण-गणै:—दिव्य गुणों के द्वारा; यदि—यदि; कर्ण-रन्ध्र:—कान के छेद ।.
 
अनुवाद
 
 हे प्रभु, हम आपसे प्रार्थना करते हैं कि जब तक हमारे हृदय तथा मन आपके चरणकमलों की सेवा में लगे रहें, हमारे शब्द (आपके कार्यों के कथन से) सुन्दर बनते रहें जिस तरह आपके चरणकमलों पर चढ़ाये गये तुलसीदल सुन्दर लगने लगते हैं तथा जब तक हमारे कान आपके दिव्य गुणों के कीर्तन से सदैव पूरित होते रहें, तब तक आप जीवन की जिस किसी भी नारकीय स्थिति में हमें जन्म दे सकते हैं।
 
तात्पर्य
 अब चारों मुनि भगवान् से अपनी दीनता दिखाते हैं, क्योंकि उन्होंने भगवान् के दो अन्य भक्तों को शाप देकर अपना अभिमान व्यक्त किया था। जय तथा विजय नामक दो द्वारपाल, जिन्होंने उन्हें वैकुण्ठलोक में प्रवेश करने से रोका था, निश्चित रूप से अपराधी थे, किन्तु वैष्णव होने के नाते इन चारों मुनियों को क्रोध में आकर उन दोनों को शाप नहीं देना चाहिए था। इस घटना के बाद उन्हें चेत हुआ कि भगवद्भक्तों को शाप देकर उन्होंने बुरा किया है, अत: उन्होंने भगवान् से प्रार्थना की कि नारकीय अवस्था में भी उनके मन भगवान् नारायण के चरणकमलों की सेवा करने से विचलित न हों। जो लोग भगवान् के भक्त होते हैं, वे जीवन की किसी भी दशा से भयभीत नहीं होते बशर्ते कि वे भगवान् की सेवा में निरन्तर लगे रहें। भगवान् नारायण के भक्तों नारायणपरों के बारे में कहा जाता है न कुतश्चन् बिभ्यति (भाग. ६.१७.२८) : वे नारकीय स्थिति में प्रवेश करने से डरते नहीं। क्योंकि वे भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति में लगे रहते हैं, अत: उनके लिए स्वर्ग या नरक एकसमान होता है। भौतिक जीवन में स्वर्ग तथा नरक दोनों ही एकसमान होते हैं, क्योंकि वे भौतिक हैं। इनमें से किसी में भी भगवान् की सेवा में लगे रहने की कोई गुंजायश नहीं है। अतएव जो लोग भगवान् की सेवा में लगे हुए हैं, वे स्वर्ग तथा नरक में कोई अन्तर नहीं देखते। ऐसा तो केवल वे भौतिकतावादी देखते हैं, जो एक की अपेक्षा दूसरे को वरीयता देते हैं।

इन चारों भक्तों ने भगवान् से प्रार्थना की कि यद्यपि भक्तों को शाप देने के कारण हम नरक जा सकते हैं, किन्तु हम भगवान् की सेवा करना न भूलें। भगवान् की दिव्य प्रेममयी सेवा तीन प्रकार से की जाती है—मनसे, वाचन से तथा कर्म से। यहाँ मुनि-गण कहते हैं कि उनकी वाणी सदैव परमेश्वर के गुणगान में लगी रहे। कोई कितनी ही अलंकारमयी या नियंत्रित व्याकरण सम्मत भाषा क्यों न बोले, किन्तु यदि उसके शब्द भगवान् की सेवा में नहीं लगते तो उसमें न तो कोई स्वाद होता है और न वह किसी लाभ की होती है। यहाँ पर तुलसी दलों का दृष्टान्त दिया गया है। तुलसी दल ओषधीय या जीवाणुनाशक दृष्टि से भी अत्यन्त उपयोगी हैं। ये पवित्र माने जाते हैं और भगवान् के चरणकमलों पर अर्पित किये जाते हैं। तुलसीदल में असंख्य सद्गुण हैं, किन्तु यदि इन्हें भगवान् के चरणकमलों पर अर्पित न किया जाता तो तुलसी का इतना महत्त्व न होता। इसी तरह कोई व्यक्ति अलंकार या व्याकरण की दृष्टि से कितने ही सुन्दर ढंग से क्यों न बोले और भौतिकतावादी श्रोता उसकी अत्यधिक प्रशंसा क्यों न करें, किन्तु यदि उसके शब्द भगवान् की सेवा में अर्पित नहीं होते तो वे व्यर्थ हैं। कान के छेद बहुत छोटे होते हैं और वे किसी नगण्य ध्वनि से पूरित हो सकते हैं, अत: वे भगवान् की महिमा जैसी महान् ध्वनि को कैसे ग्रहण कर सकते हैं? इसका उत्तर यह है कि कान के छेद आकाश की तरह हैं। जिस तरह आकाश कभी भी पूरित नहीं होता, उसी तरह कान की विशेषता है कि कोई चाहे जितनी तरह की ध्वनियाँ उड़ेलता जाय फिर भी कान अधिकाधिक ध्वनियों को ग्रहण कर सकता है। यदि भक्त को निरन्तर भगवान् की महिमा सुनने का अवसर प्राप्त होता रहे तो वह नरक जाने से भयभीत नहीं होता। हरे कृष्ण महामंत्र के कीर्तन का यही लाभ है। कोई किसी भी स्थिति में क्यों न हो, ईश्वर उसे हरे कृष्ण कीर्तन करने का अधिकार देता है। यदि जीवन की किसी भी स्थिति में मनुष्य कीर्तन करता रहे तो वह कभी भी दुखी नहीं होगा।

 
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥