श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 15: ईश्वर के साम्राज्य का वर्णन  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक
ये त्वानन्येन भावेन भावयन्त्यात्मभावनम् ।
आत्मनि प्रोतभुवनं परं सदसदात्मकम् ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
ये—वे जो; त्वा—तुम पर; अनन्येन—विचलित हुए बिना; भावेन—भक्तिपूर्वक; भावयन्ति—ध्यान करते हैं; आत्म-भावनम्— जो सारे जीवों को उत्पन्न करता है; आत्मनि—अपने भीतर; प्रोत—जुड़ा हुआ; भुवनम्—सारे लोक; परम्—परम; सत्— प्रभाव; असत्—कारण; आत्मकम्—जनक ।.
 
अनुवाद
 
 हे प्रभु, ये सारे लोक आपके भीतर विद्यमान हैं और सारे जीव आपसे उत्पन्न हुए हैं। अतएव आप इस ब्रह्माण्ड के कारण हैं और जो भी अनन्य भाव से आपका ध्यान करता है, वह भक्तियोग प्राप्त करता है।
 
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥