श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 15: ईश्वर के साम्राज्य का वर्णन  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक
यस्य वाचा प्रजा: सर्वा गावस्तन्त्येव यन्त्रिता: ।
हरन्ति बलिमायत्तास्तस्मै मुख्याय ते नम: ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
यस्य—जिसका; वाचा—वैदिक निर्देशों द्वारा; प्रजा:—जीव; सर्वा:—सारे; गाव:—बैल; तन्त्या—रस्सी से; इव—सदृश; यन्त्रिता:—निर्देशित हैं; हरन्ति—भेंट करते हैं, लेते हैं; बलिम्—भेंट, पूजा-सामग्री; आयत्ता:—नियंत्रण के अन्तर्गत; तस्मै— उसको; मुख्याय—मुख्य पुरुष को; ते—तुमको; नम:—सादर नमस्कार ।.
 
अनुवाद
 
 ब्रह्माण्ड के अन्तर्गत सारे जीव वैदिक आदेशों से उसी प्रकार संचालित होते हैं जिस तरह एक बैल अपनी नाक से बँधी रस्सी (नथुनी) से संचालित होता है। वैदिक ग्रंथों में निर्दिष्ट नियमों का उल्लंघन कोई नहीं कर सकता। उस प्रधान पुरुष को हम सादर नमस्कार करते हैं, जिसने हमें वेद दिये हैं।
 
तात्पर्य
 वैदिक ग्रंथ पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के नियम हैं। कोई भी व्यक्ति वैदिक ग्रन्थों में दिये गये आदेशों का उल्लंघन नहीं कर सकता जिस तरह कि कोई राजसत्ता के नियमों का उल्लंघन नहीं कर सकता। किसी भी सजीव प्राणी को जो जीवन में असली लाभ का इच्छुक है वैदिक वाङ्मय के आदेशानुसार कर्म करना चाहिए। इस जगत में भौतिक इन्द्रियतृप्ति के लिए आये बद्धजीव वैदिक वाङ्मय के आदेशों द्वारा संचालित होते हैं। इन्द्रियतृप्ति तो नमक की तरह से है। भोज्य पदार्थ को सुस्वाद बनाने के लिए कुछ नमक मिलाया जाता है, किन्तु कोई न तो बहुत अधिक नमक ले सकता है न बहुत कम। इस भौतिक जगत में आये हुए बद्धात्माओं को वैदिक वाङ्मय के आदेशानुसार अपनी इन्द्रियों को काम में लाना चाहिए, अन्यथा वे अधिक कष्टमय जीवन में पड़ जाएँगे। कोई भी मनुष्य या देवता वैदिक वाङ्मय जैसे नियम नहीं बना सकता, क्योंकि सारे वैदिक विधान परम पुरुष द्वारा बनाए गए हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥