श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 16: वैकुण्ठ के दो द्वारपालों, जय-विजय को मुनियों द्वारा शाप  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  3.16.11 
ये ब्राह्मणान्मयि धिया क्षिपतोऽर्चयन्त-
स्तुष्यद्‍धृद: स्मितसुधोक्षितपद्मवक्त्रा: ।
वाण्यानुरागकलयात्मजवद् गृणन्त:
सम्बोधयन्त्यहमिवाहमुपाहृतस्तै: ॥ ११ ॥
 
शब्दार्थ
ये—जो व्यक्ति; ब्राह्मणान्—ब्राह्मणजन; मयि—मुझमें; धिया—बुद्धिपूर्वक; क्षिपत:—कटुवचन बोलते हुए; अर्चयन्त:— आदर करते हुए; तुष्यत्—हर्षित हुए; हृद:—हृदय; स्मित—हँसी; सुधा—अमृत; उक्षित—नम; पद्म—कमल सदृश; वक्त्रा:— मुखमंडल; वाण्या—शब्दों से; अनुराग-कलया—प्रेम करते हुए; आत्मज-वत्—पुत्र के समान; गृणन्त:—प्रशंसा करते हुए; सम्बोधयन्ति—सान्त्वना देते हैं; अहम्—मैं; इव—सदृश; अहम्—मैं; उपाहृत:—नियंत्रित होकर; तै:—उनके द्वारा ।.
 
अनुवाद
 
 दूसरी ओर ऐसे लोग जो हृदय में पुलकित रहते हैं और अमृततुल्य हँसी से आलोकित अपने कमलमुखों से ब्राह्मणों द्वारा कटु वचन बोलने पर भी उनका आदर करते हैं, वे मुझे मोह लेते हैं। वे ब्राह्मणों को मुझ जैसा ही मानते हैं और प्रियवचनों से उनकी प्रशंसा करके उन्हें उसी तरह शान्त करते हैं जिस तरह पुत्र अपने क्रुद्ध पिता को प्रसन्न करता है या मैं तुम लोगों को शान्त कर रहा हूँ।
 
तात्पर्य
 वैदिक शास्त्रों में कई स्थानों पर यह कहा गया है कि जब ब्राह्मण या वैष्णव क्रुद्ध होकर किसी को शाप देते हैं, तो शापित व्यक्ति ब्राह्मणों या वैष्णवों के साथ वैसा ही व्यवहार करने का भार अपने ऊपर नहीं लेता। इसके अनेक उदाहरण हैं। उदाहरणार्थ, जब कुवेर के पुत्रों को नारद मुनि ने शाप दिया तो उन्होंने उसी कटु रीति से बदला नहीं लेना चाहा, अपितु आत्म-समर्पण कर दिया। यहाँ भी जब जय और विजय चार कुमारों से शापित किए गए तो वे उन से कटु रीति से पेश नहीं आए; अपितु उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया। ब्राह्मणों तथा वैष्णवों के साथ बर्ताव करने की यही विधि होनी चाहिए। कभी कभी ब्राह्मण द्वारा उत्पन्न की गई गम्भीर स्थिति का सामना करना पड़ सकता है, किन्तु उसके साथ वैसा ही व्यवहार न करके हँसकर तथा मृदु व्यवहार द्वारा उसे शान्त करने का प्रयास करना चाहिए। ब्राह्मणों तथा वैष्णवों को नारायण का पार्थिव प्रतिनिधि मानना चाहिए। आजकल कुछ मूर्ख व्यक्तियों ने दरिद्रनारायण शब्द गढ़ लिया है, जिससे यह सूचित होता है कि दरिद्र व्यक्ति को नारायण का प्रतिनिधि स्वीकार करना चाहिए। किन्तु वैदिक वाङ्मय में हम यह कहीं नहीं पाते कि दरिद्र व्यक्तियों को नारायण का प्रतिनिधि माना जाय। निस्सन्देह, “जो अलब्धशरणं या असुरक्षित हैं” का यहाँ पर उल्लेख है, किन्तु शास्त्रों से इस पद की परिभाषा स्पष्ट है। दरिद्र व्यक्ति को असुरक्षित नहीं होना चाहिए, लेकिन ब्राह्मण को विशेष रूप से नारायण का प्रतिनिधि माना जाना चाहिए और उन्हीं नारायण के समान उनकी पूजा की जानी चाहिए। इसका विशेष उल्लेख है कि ब्राह्मण को शान्त करने के लिए कमल जैसा मुख होना चाहिए। कमल जैसा मुख तब दिखता हैं जब मनुष्य प्रेम तथा वात्सल्य से अलंकृत हो। इस सम्बन्ध में पुत्र पर पिता को क्रुद्ध होने तथा पुत्र द्वारा हँसीले तथा मधुर शब्दों से पिता को शान्त करने का उदाहरण अत्यन्त उपयुक्त है।
 
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