श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 16: वैकुण्ठ के दो द्वारपालों, जय-विजय को मुनियों द्वारा शाप  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  3.16.14 
सतीं व्यादाय श‍ृण्वन्तो लघ्वीं गुर्वर्थगह्वराम् ।
विगाह्यागाधगम्भीरां न विदुस्तच्चिकीर्षितम् ॥ १४ ॥
 
शब्दार्थ
सतीम्—सर्वोत्तम; व्यादाय—ध्यानपूर्वक सुनकर; शृण्वन्त:—सुनते हुए; लघ्वीम्—ठीक से रचा हुआ; गुरु—गहन; अर्थ— आशय; गह्वराम्—समझ पाना कठिन; विगाह्य—मनन करके; अगाध—गहरा; गम्भीराम्—गम्भीर; न—नहीं; विदु:—समझते हैं; तत्—परमेश्वर का; चिकीर्षितम्—मनोभाव ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् की उत्कृष्ट वाणी इसके गहन आशय तथा इसके अत्यधिक गहन महत्व के कारण समझी जाने में कठिन थी। मुनियों ने उसे कान खोलकर सुना तथा उस पर मनन भी किया। किन्तु सुनकर भी वे यह नहीं समझ पाये कि भगवान् क्या करना चाह रहे हैं।
 
तात्पर्य
 यह समझना चाहिए कि बोलने में भगवान् से कोई पार नहीं पा सकता। परम पुरुष तथा उनकी वाणी में कोई अन्तर नहीं है, क्योंकि वे परम पद पर स्थित हैं। मुनियों ने भगवान् के होठों से निस्सृत शब्दों को कान खोलकर सुनने-समझने का प्रयास किया, किन्तु मुनिगण ठीक से समझ न पाये कि वे क्या कह रहे हैं, यद्यपि उनकी वाणी अति संक्षिप्त तथा अर्थपूर्ण थी। वे वाणी का तात्पर्य तक नहीं समझ पाये कि वे क्या कहना चाह रहे हैं। न ही वे यह समझ सके कि भगवान् उन पर क्रुद्ध हैं या प्रसन्न हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥