श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 16: वैकुण्ठ के दो द्वारपालों, जय-विजय को मुनियों द्वारा शाप  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक
ते योगमाययारब्धपारमेष्ठ्यमहोदयम् ।
प्रोचु: प्राञ्जलयो विप्रा: प्रहृष्टा: क्षुभितत्वच: ॥ १५ ॥
 
शब्दार्थ
ते—वे; योग-मायया—उनकी अन्तरंगा शक्ति द्वारा; आरब्ध—प्रकट किया गया; पारमेष्ठ्य—भगवान् का; महा-उदयम्— बहुमुखी यश; प्रोचु:—बोले; प्राञ्जलय:—हाथ जोडक़र; विप्रा:—चारों ब्राह्मण; प्रहृष्टा:—अत्यधिक प्रसन्न; क्षुभित-त्वच:— रोमांचित ।.
 
अनुवाद
 
 तो भी चारों ब्राह्मण मुनि उन्हें देखकर अतीव प्रसन्न थे और उन्होंने अपने सम्पूर्ण शरीरों में रोमांच का अनुभव किया। तब उन भगवान् से जिन्होंने अपनी योगमाया से परम पुरुष की बहुमुखी महिमा को प्रकट किया था, वे इस प्रकार बोले।
 
तात्पर्य
 चारों मुनि भगवान् के समक्ष पहली बार बोलने में उलझन सी अनुभव कर रहे थे और अतीव हर्ष के कारण उन्हें रोमांच हो आया। भौतिक जगत का सर्वोच्च ऐश्वर्य पारमेष्ठ्य कहलाता है, जो कि ब्रह्मा का ऐश्वर्य है। किन्तु इस भौतिक जगत के सर्वोच्चलोक में रहने वाले ब्रह्मा का वह भौतिक ऐश्वर्य भगवान् के ऐश्वर्य की बराबरी नहीं कर सकता, क्योंकि आध्यात्मिक जगत में दिव्य ऐश्वर्य योगमाया द्वारा उत्पन्न होता है, जबकि भौतिक जगत में यह ऐश्वर्य महामाया द्वारा उत्पन्न होता है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥