श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 16: वैकुण्ठ के दो द्वारपालों, जय-विजय को मुनियों द्वारा शाप  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक
ब्रह्मण्यस्य परं दैवं ब्राह्मणा: किल ते प्रभो ।
विप्राणां देवदेवानां भगवानात्मदैवतम् ॥ १७ ॥
 
शब्दार्थ
ब्रह्मण्यस्य—ब्राह्मण संस्कृति के परम निदशेक का; परम्—सर्वोच्च; दैवम्—स्थिति, पद; ब्राह्मणा:—ब्राह्मण जन; किल— अन्यों को शिक्षा देने के लिए; ते—तुम्हारा; प्रभो—हे प्रभु; विप्राणाम्—ब्राह्मणों का; देव-देवानाम्—देवताओं द्वारा पूजे जाने के लिए; भगवान्—भगवान्; आत्म—स्वयं; दैवतम्—पूज्य विग्रह ।.
 
अनुवाद
 
 हे प्रभु, आप ब्राह्मण संस्कृति के परम निदेशक हैं। ब्राह्मणों को सर्वोच्च पद पर आपके द्वारा माना जाना अन्यों को शिक्षा देने के लिए आपका उदाहरण है। वस्तुत: आप न केवल देवताओं के लिए, अपितु ब्राह्मणों के लिए भी परम पूज्य विग्रह हैं।
 
तात्पर्य
 ब्रह्म-संहिता में स्पष्ट कहा गया है कि भगवान् समस्त कारणों के कारण हैं। निस्सन्देह, देवता तो अनेक हैं, किन्तु उनमें प्रधान ब्रह्मा तथा शिव हैं। भगवान् विष्णु ब्रह्मा तथा शिव के प्रभु हैं, तो इस भौतिक जगत में ब्राह्मणों के विषय में क्या कहा जाय? जैसाकि भगवद्गीता में कहा गया है, भगवान् ब्राह्मण संस्कृति या इन्द्रियों तथा मन के नियंत्रण, स्वच्छता, सहिष्णुता, शास्त्रों में श्रद्धा तथा सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक ज्ञान के गुणों के अनुसार सम्पन्न सारे कार्यों के प्रति अत्यधिक अनुकूल रहते हैं। भगवान् सबों के परमात्मा हैं। भगवद्गीता में कहा गया है कि भगवान् समस्त उद्भवों के स्रोत हैं और इस तरह वे ब्रह्मा तथा शिव के भी स्रोत हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥