श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 16: वैकुण्ठ के दो द्वारपालों, जय-विजय को मुनियों द्वारा शाप  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक
त्वत्त: सनातनो धर्मो रक्ष्यते तनुभिस्तव ।
धर्मस्य परमो गुह्यो निर्विकारो भवान्मत: ॥ १८ ॥
 
शब्दार्थ
त्वत्त:—तुमसे; सनातन:—शाश्वत; धर्म:—वृत्ति; रक्ष्यते—रक्षा किया जाता है; तनुभि:—अनेक अभिव्यक्तियों द्वारा; तव— तुम्हारा; धर्मस्य—धार्मिक सिद्धान्तों का; परम:—परम; गुह्य:—विषय; निर्विकार:—अपरिवर्तनीय; भवान्—आप; मत:— हमारे मत से ।.
 
अनुवाद
 
 आप सारे जीवों की शाश्वत वृत्ति के स्रोत हैं और भगवान् के नाना स्वरूपों द्वारा आपने सदैव धर्म की रक्षा की है। आप धार्मिक नियमों के परम लक्ष्य हैं और हमारे मत से आप अक्षय तथा शाश्वत रूप से अपरिवर्तनीय हैं।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक का धर्मस्य परमो गुह्य: कथन समस्त धार्मिक सिद्धान्तों के अति गोपनीय अंश का द्योतक है। इसकी पुष्टि भगवद्गीता में हुई है। अर्जुन को दिये गये उपदेश में भगवान् कृष्ण का निष्कर्ष है “अन्य सारे धार्मिक कार्य त्याग दो और केवल मेरी शरण में आओ।” धार्मिक सिद्धान्तों को सम्पन्न करने में यह सर्वाधिक गुह्य ज्ञान है। भगवद्गीता में यह भी कहा गया है कि कोई व्यक्ति अपने नियमित धार्मिक कर्तव्यों को दृढ़तापूर्वक सम्पन्न करके यदि कोई कृष्णभावनाभावित नहीं बनता है, तो तथाकथित धार्मिक सिद्धान्तों का पालन करने में उसका सारा श्रम समय का अपव्यय मात्र है। यहाँ मुनिगण इस कथन की भी पुष्टि करते हैं कि देवता नहीं, अपितु परमेश्वर ही सारे धार्मिक सिद्धान्तों के चरम लक्ष्य हैं। ऐसे अनेक मूर्ख विज्ञापनकर्ता हैं, जो यह कहते हैं कि देवताओं की पूजा भी परम लक्ष्य तक पहुँचने की विधि है, किन्तु श्रीमद्भागवत तथा भगवद्गीता के प्रामाणिक कथनों में इसे स्वीकार नहीं किया गया है। भगवद्गीता कहती है कि जो व्यक्ति किसी विशेष देवता की पूजा करता है, वह उस देवता के लोक पहुँच सकता है, किन्तु जो पुरुषोत्तम भगवान् की पूजा करता है, वह वैकुण्ठ में प्रवेश कर सकता है। कुछ विज्ञापनकर्ता कहते हैं कि कोई चाहे जो कुछ करता रहे अन्तत: वह भगवद्धाम पहुँचेगा ही, किन्तु यह वैध नहीं है। भगवान् शाश्वत हैं और भगवान् का सेवक शाश्वत होता है तथा भगवान् का धाम भी शाश्वत है। इन सबों को यहाँ पर सनातन या शाश्वत कहा गया है। इसलिए भक्ति का फल उतना अस्थाई नहीं है जितना कि देवताओं की पूजा करने से स्वर्गलोक की प्राप्ति है। मुनिगण इस बात पर बल देना चाह रहे थे कि यद्यपि भगवान् अपनी अहैतुकी कृपा से यह कहते हैं कि वे ब्राह्मणों तथा वैष्णवों की पूजा करते हैं, किन्तु वस्तुत: भगवान् न केवल ब्राह्मणों तथा वैष्णवों द्वारा पूजित हैं, अपितु देवताओं द्वारा भी पूजित हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥