श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 16: वैकुण्ठ के दो द्वारपालों, जय-विजय को मुनियों द्वारा शाप  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक
तरन्ति ह्यञ्जसा मृत्युं निवृत्ता यदनुग्रहात् ।
योगिन: स भवान् किंस्विदनुगृह्येत यत्परै: ॥ १९ ॥
 
शब्दार्थ
तरन्ति—पार करते हैं; हि—क्योंकि; अञ्जसा—आसानी से; मृत्युम्—जन्म तथा मृत्यु को; निवृत्ता:—सारी भौतिक इच्छाओं को छोड़ करके; यत्—तुम्हारे; अनुग्रहात्—कृपा से; योगिन:—योगीजन; स:—परमेश्वर; भवान्—आप; किम् स्वित्—कभी सम्भव नहीं; अनुगृह्येत—अनुग्रह किया जा सकता है; यत्—जो; परै:—अन्यों द्वारा ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् की कृपा से योगीजन तथा अध्यात्मवादी समस्त भौतिक इच्छाओं को छोडक़र अज्ञान को पार कर जाते हैं। इसलिए यह सम्भव नहीं कि कोई परमेश्वर पर अनुग्रह कर सके।
 
तात्पर्य
 जब तक किसी पर परमेश्वर की कृपा नहीं होती तब तक वह बारम्बार होने वाले जन्म तथा मृत्यु के अज्ञान-सागर को पार नहीं कर सकता। यहाँ यह कहा गया है कि योगीजन या अध्यात्मवादी लोग भगवान् की कृपा से अज्ञान-सागर को पार कर जाते हैं। योगी कई प्रकार के हैं यथा कर्मयोगी, ज्ञानयोगी, ध्यानयोगी तथा भक्तियोगी। कर्मीजन तो विशेष रूप से देवताओं की कृपा की खोज करते हैं, ज्ञानीजन परब्रह्म से एकाकार हो जाना चाहते हैं तथा योगीजन भगवान् (परमात्मा) की आंशिक झलक मात्र से और अन्त में उनसे एकत्व प्राप्त करने से तुष्ट हो जाते हैं। किन्तु भक्तगण तो पूर्ण पुरुषोत्तम
भगवान् का शाश्वत सान्निध्य पाना और उनकी सेवा करना चाहते हैं। यह पहले ही माना जा चुका है कि भगवान् शाश्वत हैं और जो लोग परमेश्वर का निरन्तर अनुग्रह चाहते हैं, वे भी शाश्वत हैं। इसलिए यहाँ पर योगियों का अर्थ भक्त है। भगवत्कृपा से भक्तगण जन्म तथा मृत्यु के अज्ञान को सरलता से पार कर सकते हैं और भगवान् के नित्य धाम को प्राप्त कर सकते हैं। इसलिए भगवान् को अन्य की कृपा की आवश्यकता नहीं रहती, क्योंकि कोई न तो उनके तुल्य है, न ही उनसे बढक़र है। वस्तुत: अपने मानव उद्देश्य की सफल जानकारी के लिए सबों को भगवान् की कृपा की आवश्यकता पड़ती है।
 
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥