श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 16: वैकुण्ठ के दो द्वारपालों, जय-विजय को मुनियों द्वारा शाप  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक
यं वै विभूतिरुपयात्यनुवेलमन्यै-
रर्थार्थिभि: स्वशिरसा धृतपादरेणु: ।
धन्यार्पिताङ्‌घ्रितुलसीनवदामधाम्नो
लोकं मधुव्रतपतेरिव कामयाना ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
यम्—जिसको; वै—निश्चय ही; विभूति:—लक्ष्मी जी; उपयाति—प्रतीक्षा में खड़ी रहती है; अनुवेलम्—यदा कदा; अन्यै:— अन्यों के द्वारा; अर्थ—भौतिक सुविधा; अर्थिभि:—चाहने वालों के द्वारा; स्व-शिरसा—अपने अपने सिरों पर; धृत—स्वीकार करते हुए; पाद—पाँवों की; रेणु:—धूल; धन्य—भक्तों के द्वारा; अर्पित—अर्पित; अङ्घ्रि—आपके चरणों पर; तुलसी—तुलसी दल के; नव—नवीन; दाम—माला पर; धाम्न:—स्थान वाला; लोकम्—स्थान; मधु-व्रत-पते:—भौरों के राजा का; इव— सदृश; काम-याना—प्राप्त करने के लिए उत्सुक है ।.
 
अनुवाद
 
 जिनके चरणों की धूल अन्य लोग अपने शिरों पर धारण करते हैं, वहीं लक्ष्मीदेवी आपकी पूर्व निर्धारित सेवा में रहती हैं, क्योंकि वे उन भौंरों के राजा के धाम में स्थान सुरक्षित करने के लिए उत्सुक रहती हैं, जो आपके चरणों पर किसी धन्य भक्त के द्वारा अर्पित तुलसीदलों की ताजी माला पर मँडराता है।
 
तात्पर्य
 जैसाकि पहले वर्णन किया जा चुका है, भगवान् के चरणकमलों पर चढ़ाये जाने के कारण तुलसी को सारे श्रेष्ठतम गुण मिले हैं। यहाँ पर प्रयुक्त उपमा अति उत्तम है। जिस तरह भौंरों का राजा भगवान् के चरणकमलों पर अर्पित तुलसी दलों पर मँडराता रहता है उसी प्रकार लक्ष्मीजी, जिनकी तलाश देवताओं, ब्राह्मणों, वैष्णवों तथा अन्य सबों को रहती है, भगवान् के चरणकमलों की सेवा में सदैव ही लगी रहती हैं। निष्कर्ष यह है कि कोई व्यक्ति भगवान् का उपकारी नहीं हो सकता। वस्तुत: प्रत्येक व्यक्ति भगवान् के दास का दास है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥