श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 16: वैकुण्ठ के दो द्वारपालों, जय-विजय को मुनियों द्वारा शाप  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक
यस्तां विविक्तचरितैरनुवर्तमानां
नात्याद्रियत्परमभागवतप्रसङ्ग: ।
स त्वं द्विजानुपथपुण्यरज: पुनीत:
श्रीवत्सलक्ष्म किमगा भगभाजनस्त्वम् ॥ २१ ॥
 
शब्दार्थ
य:—जो; ताम्—लक्ष्मी को; विविक्त—नितान्त शुद्ध; चरितै:—भक्ति; अनुवर्तमानाम्—सेवा करते हुए; न—नहीं; अत्याद्रियत्—अनुरक्त; परम—सर्वाधिक; भागवत—भक्तगण; प्रसङ्ग:—अनुरक्त; स:—परमेश्वर; त्वम्—तुम; द्विज—ब्राह्मणों के; अनुपथ—पथ पर; पुण्य—पवित्र की गई; रज:—धूल; पुनीत:—शुद्ध किया हुआ; श्रीवत्स—श्रीवत्स का; लक्ष्म—चिह्न; किम्—क्या; अगा:—तुमने प्राप्त किया है; भग—सारे ऐश्वर्य या सारे सद्गुण; भाजन:—आगार; त्वम्—तुम ।.
 
अनुवाद
 
 हे प्रभु, आप अपने शुद्ध भक्तों के कार्यों के प्रति अत्यधिक अनुरक्त रहते हैं फिर भी आप उन लक्ष्मीजी से कभी अनुरक्त नहीं रहते जो निरन्तर आपकी दिव्य प्रेमाभक्ति में लगी रहती हैं। अतएव आप उस पथ की धूल द्वारा कैसे शुद्ध हो सकते हैं जिन पर ब्राह्मण चलते हैं, और अपने वक्षस्थल पर श्रीवत्स चिन्ह के द्वारा आप किस तरह महिमामंडित या भाग्यशाली बन सकते हैं?
 
तात्पर्य
 ब्रह्म-संहिता में कहा गया है कि भगवान् अपने वैकुण्ठ लोक में लाखों लक्ष्मियों द्वारा सदैव सेवित होते हैं, किन्तु समस्त ऐश्वर्यों से विरक्त रहने की भावना से वे उनमें से किसी के प्रति भी अनुरक्त नहीं होते। भगवान् के छह ऐश्वर्य हैं—असीम सम्पत्ति, असीम यश, असीम बल, असीम सौन्दर्य, असीम ज्ञान तथा असीम त्याग। सारे देवता तथा अन्य जीव लक्ष्मीजी की कृपा पाने के लिए उनकी पूजा करते हैं। फिर भी भगवान् उन लक्ष्मीजी के प्रति अनुरक्त नहीं रहते, क्योंकि अपनी दिव्य सेवा कराने के लिए वे असंख्य लक्ष्मियों को उत्पन्न कर सकते हैं। कभी-कभी लक्ष्मीजी को उन तुलसी दलों से ईर्ष्या होती है, जो भगवान् के चरणकमलों पर चढ़ाये जाते हैं, क्योंकि वे दल वहीं पर स्थिर रहते हैं और हटते नहीं जबकि लक्ष्मीजी, उनके वक्षस्थल पर स्थित रहते हुए भी, कभी कभी उन अन्य भक्तों को प्रसन्न करने के लिए जाती रहती हैं, जो उनकी कृपा पाने के लिए प्रार्थना करते हैं। लक्ष्मी जी को कभी कभी अपने असंख्य भक्तों को तुष्ट करने जाना पड़ता है, किन्तु तुलसीदल कभी अपने स्थान को नहीं छोड़ते। इसीलिए भगवान् लक्ष्मीजी की सेवा की अपेक्षा तुलसी की सेवा को अधिक चाहते हैं। इसलिए जब भगवान् यह कहते हैं कि ब्राह्मणों की अहैतुकी कृपा से ही लक्ष्मीजी उन्हें नहीं छोड़तीं तो हम यह समझ सकते हैं कि लक्ष्मीजी भगवान् के ऐश्वर्य से आकृष्ट होती हैं, उन पर ब्राह्मणों के आशीर्वादों के कारण नहीं। भगवान् अपने ऐश्वर्य के लिए किसी की कृपा पर आश्रित नहीं हैं, वे सदैव आत्माराम हैं। भगवान् का यह कथन कि उनका ऐश्वर्य ब्राह्मणों तथा वैष्णवों के आशीष के कारण है, अन्य लोगों को यह शिक्षा देने के लिए है कि वे ब्राह्मणों तथा वैष्णवों का आदर करें जो भगवान् के ही भक्त होते हैं।
 
शेयर करें
       
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
  Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.

 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥