श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 16: वैकुण्ठ के दो द्वारपालों, जय-विजय को मुनियों द्वारा शाप  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक
न त्वं द्विजोत्तमकुलं यदिहात्मगोपं
गोप्ता वृष: स्वर्हणेन ससूनृतेन ।
तर्ह्येव नङ्‌क्ष्यति शिवस्तव देव पन्था
लोकोऽग्रहीष्यद‍ृषभस्य हितत्प्रमाणम् ॥ २३ ॥
 
शब्दार्थ
न—नहीं; त्वम्—तुम; द्विज—दो बार जन्म लेने वाले का; उत्तम-कुलम्—सर्वोच्च जाति; यदि—यदि; ह—निस्सन्देह; आत्म- गोपम्—आपके द्वारा रक्षित होने के योग्य; गोप्ता—रक्षक; वृष:—सर्वोत्कृष्ट; सु-अर्हणेन—पूजा द्वारा; स-सूनृतेन—मृदु शब्दों के साथ साथ; तर्हि—तब; एव—निश्चय ही; नङ्क्ष्यति—खो जायेगा; शिव:—शुभ; तव—तुम्हारा; देव—हे प्रभु; पन्था:— पथ; लोक:—सामान्यजन; अग्रहीष्यत्—स्वीकार करेगा; ऋषभस्य—सर्वोत्कृष्ट का; हि—क्योंकि; तत्—वह; प्रमाणम्— प्रमाण ।.
 
अनुवाद
 
 हे प्रभु, आप सर्वोच्च द्विजों के रक्षक हैं। यदि आप पूजा तथा मृदु वचनों को अर्पित करके उनकी रक्षा न करें तो निश्चित है कि पूजा का शुभ मार्ग उन सामान्यजनों द्वारा परित्यक्त कर दिया जाएगा जो आपके बल तथा प्रभुत्व पर कर्म करते हैं।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता में स्वयं भगवान् ने कहा है कि महापुरुषों के कार्यों तथा चरित्र का अनुसरण सामान्य जनों द्वारा किया जाता है। इसीलिए समाज में आदर्श चरित्र वाले नायकों की आवश्यकता पड़ती है। कृष्ण अर्थात् पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, इस जगत में पूर्ण प्रभुत्व का दृष्टान्त प्रस्तुत करने के लिए ही प्रकट हुए और लोगों को उसी मार्ग का अनुसरण करना होता है। वैदिक आदेश है कि मनुष्य मात्र मानसिक चिन्तन या तर्क द्वारा परब्रह्म को नहीं समझ सकता। उसे महापुरुषों का अनुसरण करना होता है। महाजनो येन गत: स पन्था:। महापुरुषों का अनुसरण किया जाना चाहिए—अन्यथा यदि हम शास्त्रों पर ही अवलम्बित रहें तो कभी कभी हम धूर्तों द्वारा गुमराह किये जा सकते हैं या फिर हम विभिन्न आध्यात्मिक आदेशों को समझ नहीं पाते, अथवा उनका अनुसरण नहीं कर पाते। सर्वोत्तम मार्ग यही है कि महापुरुषों का अनुसरण किया जाय। चारों ब्राह्मण मुनियों ने कहा कि कृष्ण स्वभावत: गौवों तथा ब्राह्मणों के रक्षक हैं—गोब्राह्मणहिताय च। जब कृष्ण इस लोक में थे तो उन्होंने व्यावहारिक दृष्टान्त प्रस्तुत किया था। वे ग्वालबाल थे और वे ब्राह्मणों तथा भक्तों का अत्यधिक आदर करते थे।

यहाँ पर इसकी भी पुष्टि हुई है कि ब्राह्मण सर्वश्रेष्ठ द्विज हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य—तीनों ही द्विज हैं, किन्तु इनमें से ब्राह्मण सर्वश्रेष्ठ हैं। जब दो व्यक्तियों में झगड़ा होता है, तो हर व्यक्ति अपने शरीर के ऊपरी भाग सिर, बाहें तथा उदर—की रक्षा करता है। इसी तरह मानव सभ्यता की असली प्रगति में, सामाजिक शरीर के सर्वोत्तम भाग यथा ब्राह्मणों, क्षत्रियों तथा वैश्यों को विशेष सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए श्रमिकों की सुरक्षा की उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए किन्तु उच्च जातियों को विशेष सुरक्षा दी जानी चाहिए। मनुष्यों के सारे वर्गों में ब्राह्मणों तथा वैष्णवों को विशेष सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए। उनकी पूजा की जानी चाहिए। जब उनकी रक्षा की जाती है, तो यह ईश्वर के पूजन जैसा होता है। यह यथार्थत: सुरक्षा नहीं है। यह कर्तव्य है। मनुष्य को चाहिए कि ब्राह्मणों तथा वैष्णवों को सभी प्रकार से सम्पत्ति तथा मृदु वचन अर्पित करके उनकी पूजा करे। यदि किसी के पास कुछ भी अर्पित करने का कोई साधन नहीं है, तो उन्हें शान्त करने के लिए कम से कम मधुर वचनों का प्रयोग तो करे। भगवान् ने स्वयं कुमारों के प्रति ऐसा आचरण दर्शाया।

यदि नेतृत्व करने वाले इस प्रणाली का सूत्रपात्र नहीं करते तो मानव सभ्यता विनष्ट हो जायेगी। जब कभी भगवान् के भक्तों के लिए जो कि आध्यात्मिक जीवन में अत्यधिक बुद्धिमान हैं कोई सुरक्षा तथा विशिष्ट व्यवहार नहीं होता तब सारा समाज विनष्ट हो जाता है। नङ्क्ष्यति शब्द सूचित करता है कि ऐसी सभ्यता नष्ट-भ्रष्ट हो जाती है और उसका संहार हो जाता है। जिस प्रकार की सभ्यता संस्तुत की गई है, वह देवपथ कहलाती है, जिसका अर्थ है “देवताओं का राजमार्ग।” देवताओं से अपेक्षा की जाती है कि वे भक्ति में अथवा कृष्णभावनामृत में पूर्णतया स्थिर हों। यही शुभमार्ग है, जिसकी रक्षा की जानी चाहिए। यदि समाज के महापुरुष या नेता ब्राह्मणों तथा वैष्णवों को विशेष सम्मान नहीं प्रदान करते और उन्हें केवल मधुर वाणी ही नहीं, अपितु सारी सुविधाएँ नहीं देते तो मानव सभ्यता की प्रगति का मार्ग नष्ट हो जायेगा। भगवान् स्वयं ही इसकी शिक्षा देना चाहते थे इसलिए उन्होंने कुमारों की इतनी प्रशंसा की।

 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥