श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 16: वैकुण्ठ के दो द्वारपालों, जय-विजय को मुनियों द्वारा शाप  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक
यं वानयोर्दममधीश भवान् विधत्ते
वृत्तिं नु वा तदनुमन्महि निर्व्यलीकम् ।
अस्मासु वा य उचितो ध्रियतां स दण्डो
येऽनागसौ वयमयुङ्‌क्ष्महि किल्बिषेण ॥ २५ ॥
 
शब्दार्थ
यम्—जो; वा—अथवा; अनयो:—उन दोनों का; दमम्—दण्ड; अधीश—हे प्रभु; भवान्—आप; विधत्ते—प्रदान करता है; वृत्तिम्—अच्छा जीवन; नु—निश्चय ही; वा—अथवा; तत्—वह; अनुमन्महि—हम स्वीकार करते हैं; निर्व्यलीकम्—द्वैतरहित; अस्मासु—हमको; वा—अथवा; य:—जो भी; उचित:—उचित हो; ध्रियताम्—प्रदान किया जाय; स:—वह; दण्ड:—दण्ड; ये—जो; अनागसौ—पापरहित; वयम्—हम; अयुङ्क्ष्महि—नियत किया है; किल्बिषेण—शाप से ।.
 
अनुवाद
 
 हे प्रभु, आप इन दोनों निर्दोष व्यक्तियों को या हमें भी जो दण्ड देना चाहेंगे उसे हम बिना द्वैत के स्वीकार करेंगे। हम जानते हैं कि हमने दो निर्दोष व्यक्तियों को शाप दिया है।
 
तात्पर्य
 अब चारों कुमार मुनिगण जय तथा विजय नामक दो द्वारपालों को दिये गये शाप को निरस्त करते हैं, क्योंकि अब उन्हें यह चेत हुआ है कि भगवान् की सेवा में लगा रहने वाला व्यक्ति किसी भी अवस्था में दोषी नहीं हो सकता। यह कहा गया है कि जिसे भी भगवान् की सेवा में अन्तर्निहित श्रद्धा हो या जो वास्तव में दिव्य प्रेमाभक्ति में लगा हुआ हो उसमें देवताओं के सारे सद्गुण होते हैं। अतएव भक्त कभी भी दोषी नहीं हो सकता। यदि कभी यह पाया जाय कि उसने संयोगवश या किसी क्षणिक व्यवस्था के कारण कोई त्रुटि की है, तो उसे गम्भीरता से नहीं लिया जाना चाहिए। यहाँ पर जय तथा विजय के शापित होने पर पछतावा व्यक्त किया जा रहा है। अब कुमारगण अपनी स्थिति को रजो तथा तमो गुणों के रूप में सोच रहे हैं और वे भगवान् द्वारा दिये जाने वाले किसी भी प्रकार के दण्ड को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं। सामान्यतया भक्तों के साथ बर्ताव करते समय हमें दोष ढूँढने का प्रयास नहीं करना चाहिए। भगवद्गीता में भी पुष्टि हुई है कि जो भक्त निष्ठापूर्वक परमेश्वर की सेवा करता है, वह यदि भारी भूल करता भी पाया जाय तो भी उसे साधु ही मानना चाहिए। वह अपनी पहले की आदतों के कारण कोई त्रुटि कर सकता है, किन्तु उसके भगवान् की सेवा में लगे रहने के कारण उस त्रुटि को गम्भीरता से नहीं लेना चाहिए।
 
शेयर करें
       
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
  Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.

 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥