श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 16: वैकुण्ठ के दो द्वारपालों, जय-विजय को मुनियों द्वारा शाप  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक
श्रीभगवानुवाच
एतौ सुरेतरगतिं प्रतिपद्य सद्य:
संरम्भसम्भृतसमाध्यनुबद्धयोगौ ।
भूय: सकाशमुपयास्यत आशु यो व:
शापो मयैव निमितस्तदवेत विप्रा: ॥ २६ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-भगवान् उवाच—भगवान् ने उत्तर दिया; एतौ—ये दोनों द्वारपाल; सुर-इतर—आसुरी; गतिम्—गर्भ; प्रतिपद्य—पाकर; सद्य:—शीघ्र ही; संरम्भ—क्रोध से; सम्भृत—सम्वर्धित होकर; समाधि—मन की एकाग्रता; अनुबद्ध—दृढ़तापूर्वक; योगौ— मुझसे बँधे; भूय:—पुत्र; सकाशम्—मेरे पास; उपयास्यत:—लौटेंगे; आशु—शीघ्र ही; य:—जो; व:—तुम्हारा; शाप:—शाप; मया—मेरे द्वारा; एव—एकमात्र; निमित:—नियत; तत्—वह; अवेत—जानो; विप्रा:—हे ब्राह्मणो ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् ने उत्तर दिया : हे ब्राह्मणो, यह जान लो कि तुमने उनको जो दण्ड दिया है, वह मूलत: मेरे द्वारा निश्चित किया गया था, अत: वे आसुरी परिवार में जन्म लेने के लिए पतित होंगे। किन्तु वे क्रोध द्वारा वर्धित मानसिक एकाग्रता द्वारा मेरे विचार में मुझसे दृढ़तापूर्वक संयुक्त होंगे और शीघ्र ही मेरे पास लौट आयेंगे।
 
तात्पर्य
 भगवान् ने कहा कि मुनियों द्वारा जय तथा विजय द्वारपालों को जो दण्ड दिया गया था उसकी योजना स्वयं भगवान् द्वारा बनाई गई थी। भगवान् की स्वीकृति के बिना कुछ भी घटित नहीं हो सकता। यह समझ लेना होगा कि वैकुण्ठ में भगवान् के भक्तों को शाप देने के पीछे एक योजना थी और उनकी इस योजना की व्याख्या कई उद्भट अधिकारियों ने की है। कभी कभी भगवान् युद्ध करना चाहते हैं। भगवान् में भी युद्ध करने का उत्साह पाया जाता है, अन्यथा युद्ध क्योंकर प्रकट होता? चूँकि भगवान् हर वस्तु के स्रोत हैं, अत: क्रोध तथा युद्ध प्रवृत्ति भी उनमें निहित रहती है। जब वे किसी के साथ युद्ध करना चाहते हैं, तो उन्हें शत्रु खोजना पड़ता है, किन्तु वैकुण्ठलोक में एक भी शत्रु नहीं है, क्योंकि सारे लोग भगवान् की सेवा में पूर्णतया लगे रहते हैं। इसीलिए कभी कभी वे अपना युद्ध में उत्साह प्रकट करने हेतु इस भौतिक जगत में अवतार-रूप में आते हैं।
भगवद्गीता (४.८) में भी कहा गया है कि भगवान् भक्तों को सुरक्षा प्रदान करने तथा अभक्तों का विनाश करने के लिए ही प्रकट होते हैं। अभक्तगण भौतिक जगत में पाये जाते हैं, आध्यात्मिक जगत में नहीं। अत: जब भगवान् युद्ध करना चाहते हैं, तो उन्हें इस जगत में आना पड़ता है। किन्तु परम प्रभु से युद्ध कौन करेगा? कोई भी उनसे युद्ध करने में सक्षम नहीं है। इसलिए क्योंकि इस जगत में भगवान् की लीलाएँ अपने संगियों के ही साथ सम्पन्न की जाती हैं, अन्यों के साथ नहीं, अत: उन्हें ऐसा भक्त ढूँढना पड़ता है, जो शत्रु का अभिनय कर सके। भगवद्गीता में अर्जुन से भगवान् कहते हैं, “हे अर्जुन! तुम तथा मैं दोनों ही इस जगत में कई बार प्रकट हो चुके हैं, किन्तु तुम इसे भूल गये हो जबकि मुझे स्मरण है।” इस तरह भगवान् ने जय तथा विजय से भौतिक जगत में युद्ध करने के लिए उन्हें चुना और यही कारण था कि मुनिगण उन्हें देखने के लिए आये थे और संयोग-वश द्वारपालों को शाप दे दिया गया। भगवान् चाहते थे कि वे दोनों भौतिक जगत में भेजे जाँय, सदा के लिए नहीं बल्कि थोड़े समय के लिए। अतएव, जिस तरह कोई व्यक्ति रंगमच पर मंच के स्वामी के साथ शत्रु का अभिनय करता है, यद्यपि यह नाटक थोड़े समय के लिए होता है और सेवक तथा स्वामी के मध्य स्थायी शत्रुता नहीं रहती, उसी तरह सुरजनों (भक्तगणों) को असुरजन या नास्तिक परिवार में जाने के लिए मुनियों द्वारा शाप दिया गया था। कोई भक्त नास्तिक परिवार में जाय, यह आश्चर्यजनक है, किन्तु है केवल दिखावा। छद्म युद्ध समाप्त करने के बाद भक्त तथा भगवान् दोनों पुन: आध्यात्मिक लोकों में मिल जाते हैं। यहाँ पर इसकी स्पष्ट व्याख्या की गई है। निष्कर्ष यह है कि कोई वैकुण्ठलोक से कभी पतित नहीं होता, क्योंकि यह नित्य धाम है। किन्तु भगवान् की इच्छानुसार भक्तगण इस जगत में उपदेशकों या नास्तिकों के रूप में आते हैं। हमें यह समझ लेना चाहिए कि प्रत्येक घटना के पीछे भगवान् की योजना रहती है। उदाहरणार्थ, भगवान् बुद्ध अवतार थे फिर भी उन्होंने नास्तिकता का उपदेश दिया, “ईश्वर नहीं है।” किन्तु वास्तव में इसके पीछे एक योजना थी जिसकी कि भागवत में व्याख्या की गई है।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥