श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 16: वैकुण्ठ के दो द्वारपालों, जय-विजय को मुनियों द्वारा शाप  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक
ब्रह्मोवाच
अथ ते मुनयो दृष्ट्वा नयनानन्दभाजनम् ।
वैकुण्ठं तदधिष्ठानं विकुण्ठं च स्वयंप्रभम् ॥ २७ ॥
 
शब्दार्थ
ब्रह्मा उवाच—ब्रह्मा ने कहा; अथ—अब; ते—वे; मुनय:—मुनिगण; दृष्ट्वा—देखकर; नयन—आँखों का; आनन्द—आनन्द; भाजनम्—उत्पन्न करते हुए; वैकुण्ठम्—वैकुण्ठ लोक; तत्—उसका; अधिष्ठानम्—धाम; विकुण्ठम्—भगवान्; च—तथा; स्वयम्-प्रभम्—आत्म-ज्योतित ।.
 
अनुवाद
 
 ब्रह्माजी ने कहा : वैकुण्ठ के स्वामी पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को आत्मज्योतित वैकुण्ठलोक में देखने के बाद मुनियों ने वह दिव्य धाम छोड़ दिया।
 
तात्पर्य
 जैसाकि भगवद्गीता में कहा गया है और इस श्लोक में पुष्टि की गई है, भगवान् का दिव्य धाम स्वयं प्रकाशमान है। भगवद्गीता में कहा गया है कि आध्यात्मिक जगत में सूर्य, चन्द्रमा या बिजली की आवश्यकता नहीं पड़ती। यह कथन सूचित करता है कि सारे लोक स्वत:प्रकाशित, आत्मनिर्भर तथा स्वतंत्र हैं। वहाँ पर प्रत्येक वस्तु पूर्ण होती है। भगवान् कृष्ण कहते हैं कि जो एक बार वैकुण्ठलोक चला जाता है, वह कभी नहीं लौटता। वैकुण्ठलोक के निवासी भौतिक जगत में कभी वापस नहीं आते, किन्तु जय तथा विजय की घटना भिन्न प्रकार की थी। वे कुछ काल के लिए भौतिक जगत में आये और तब वैकुण्ठलोक में लौट गये।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥