श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 16: वैकुण्ठ के दो द्वारपालों, जय-विजय को मुनियों द्वारा शाप  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक
भगवाननुगावाह यातं मा भैष्टमस्तु शम् ।
ब्रह्मतेज: समर्थोऽपि हन्तुं नेच्छे मतं तु मे ॥ २९ ॥
 
शब्दार्थ
भगवान्—भगवान् ने; अनुगौ—अपने दोनों सेवकों (अनुचरों) से; आह—कहा; यातम्—इस स्थान से जाओ; मा—मत; भैष्टम्—डरो; अस्तु—हो; शम्—सुख; ब्रह्म—ब्राह्मण का; तेज:—शाप; समर्थ:—समर्थ होने से; अपि—भी; हन्तुम्—निरस्त करने के लिए; न इच्छे—नहीं चाहता; मतम्—अनुमोदित; तु—प्रत्युत; मे—मेरे द्वारा ।.
 
अनुवाद
 
 तब भगवान् ने अपने सेवकों जय तथा विजय से कहा : इस स्थान से चले जाओ, किन्तु डरो मत। तुम लोगों की जय हो। यद्यपि मैं ब्राह्मणों के शाप को निरस्त कर सकता हूँ, किन्तु मैं ऐसा करूँगा नहीं। प्रत्युत इसे मेरा समर्थन प्राप्त है।
 
तात्पर्य
 जैसाकि श्लोक २६ के सम्बन्ध में बतलाया गया है, जितनी भी घटना घटी है उन्हें भगवान् का समर्थन प्राप्त था। सामान्यतया इसकी सम्भावना नहीं थी कि चारों मुनि द्वारपालों पर इतना क्रुद्ध होते, न ही भगवान् अपने दो द्वारपालों की उपेक्षा कर सकते थे, न वैकुण्ठ में एक बार जन्म लेकर कोई वहाँ से वापस आ सकता है। इसलिए ये सारी की सारी घटनाएँ भौतिक जगत में अपनी लीलाओं के हेतु स्वयं
भगवान् द्वारा अभिकल्पित थीं। इस तरह वे साफ-साफ कहते हैं कि यह उनकी सहमति से किया गया है। अन्यथा केवल ब्राह्मण-शाप के कारण वैकुण्ठ के वासियों का इस भौतिक जगत में वापस आना असम्भव होता। भगवान् ने इन तथाकथित दोषियों को विशेष रूप से आशीर्वाद दिया, “तुम लोगों की जय हो।” भगवान् जिसे एक बार स्वीकार कर लेते हैं वह भक्त कभी पतित नहीं होता। यही इस घटना का निष्कर्ष है।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥