श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 16: वैकुण्ठ के दो द्वारपालों, जय-विजय को मुनियों द्वारा शाप  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक
तयोरसुरयोरद्य तेजसा यमयोर्हि व: ।
आक्षिप्तं तेज एतर्हि भगवांस्तद्विधित्सति ॥ ३६ ॥
 
शब्दार्थ
तयो:—उन; असुरयो:—दोनों असुरों के; अद्य—आज; तेजसा—तेज से; यमयो:—जुड़वों का; हि—निश्चय ही; व:—तुम सारे देवताओं का; आक्षिप्तम्—क्षुब्ध; तेज:—शक्ति; एतर्हि—इस प्रकार निश्चय ही; भगवान्—भगवान्; तत्—वह; विधित्सति— करना चाहता है ।.
 
अनुवाद
 
 यह इन जुड़वे असुरों का तेज है, जिसने तुम सबों को विचलित किया है, क्योंकि इसने तुम्हारी शक्ति को कम कर दिया है। किन्तु मेरी शक्ति में कोई इसका उपचार नहीं है, क्योंकि भगवान् स्वयं ही यह सब करना चाहते हैं।
 
तात्पर्य
 यद्यपि हिरण्यकशिपु तथा हिरण्याक्ष, जो पहले जय तथा विजय थे, असुर बने, किन्तु इस जगत के देवता उन्हें नियंत्रित नहीं कर सके, अतएव ब्रह्मा ने कहा कि न तो वे, न ही सारे देवता, उनके द्वारा किये जा रहे उपद्रवों का शमन कर सकते थे। वे इस जगत में भगवान् के आदेश से आये थे और वे ही ऐसे उत्पातों का शमन कर सकते थे। दूसरे शब्दों में, यद्यपि जय तथा विजय ने असुरों के शरीर धारण कर लिये थे, किन्तु वे अन्यों की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली बने रहे। इस तरह यह सिद्ध हो गया कि भगवान् में युद्ध करने की इच्छा थी, क्योंकि उनके भीतर युद्ध करने की भी भावना रहती है। वे हर बात में मौलिक हैं, किन्तु जब वे युद्ध करना चाहते हैं, तो उन्हें भक्त के साथ युद्ध करना होता है। इसलिए उनकी इच्छा से ही जय तथा विजय को कुमारों द्वारा शापित होना पड़ा। भगवान् ने द्वारपालों को भौतिक जगत में जाकर अपने शत्रु बनने का आदेश दिया जिससे वे उनसे युद्ध कर सकें। इस तरह युद्ध करने की उनकी इच्छा की तुष्टि उनके निजी भक्तों की सेवा द्वारा हो सकेगी।

ब्रह्मा ने देवताओं को दिखलाया कि अंधकार के द्वारा उत्पन्न स्थिति जिसके कारण वे सभी विचलित थे परमेश्वर की इच्छा थी। वे यह दिखा देना चाहते थे कि यद्यपि ये दोनों अनुचर असुरों के रूप में आ रहे थे, वे अत्यन्त शक्तिशाली थे, देवताओं से भी बढक़र जो उनको नियंत्रित नहीं कर सके। कोई भी परमेश्वर के कार्यों का पार नहीं पा सकता। देवताओं को यह भी सलाह दी गई है कि इस घटना का निवारण करने का प्रयास न करें, क्योंकि यह भगवान् द्वारा आदेशित थी। इसी तरह कोई भी व्यक्ति जिसे इस जगत में कोई कार्य करने का, विशेष रूप से उनकी महिमा का प्रचार करने का, आदेश दिया जाता है, उसका प्रतिकार कोई नहीं कर सकता। सभी परिस्थितियों में भगवान् की इच्छा पूरी होकर रहती है।

 
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