श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 16: वैकुण्ठ के दो द्वारपालों, जय-विजय को मुनियों द्वारा शाप  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक
यन्नामानि च गृह्णाति लोको भृत्ये कृतागसि ।
सोऽसाधुवादस्तत्कीर्तिं हन्ति त्वचमिवामय: ॥ ५ ॥
 
शब्दार्थ
यत्—जिसके; नामानि—नाम; च—तथा; गृह्णाति—ग्रहण करता है; लोक:—सामान्य जन; भृत्ये—जब एक सेवक; कृत- आगसि—कुछ गलती कर चुकता है; स:—वह; असाधु-वाद:—दोष; तत्—उस व्यक्ति की; कीर्तिम्—ख्याति; हन्ति—नष्ट करता है; त्वचम्—चमड़ी; इव—सदृश; आमय:—कोढ़ ।.
 
अनुवाद
 
 किसी सेवक द्वारा किये गये गलत कार्य से सामान्य तौर पर लोग उसके स्वामी को दोष देते हैं जिस तरह शरीर के किसी भी अंग पर श्वेत कुष्ट के धब्बे सारे चमड़ी को दूषित बना देते हैं।
 
तात्पर्य
 अतएव वैष्णव को पूरी तरह सुयोग्य होना चाहिए। जैसाकि भागवत में कहा गया है, जो कोई वैष्णव बन जाता है उसमें देवता के सारे सद्गुण आ जाते हैं। चैतन्य-चरितामृत में छब्बीस गुणों का उल्लेख हुआ है। एक भक्त को सदैव यह देखना चाहिए कि कृष्णभावनामृत में प्रगति के साथ साथ उसके वैष्णव गुणों में वृद्धि हो। भक्त को दोषरहित रहना चाहिए, क्योंकि भक्त द्वारा किया गया कोई अपराध भगवान् पर दाग है। भक्त का कर्तव्य है कि अन्यों के साथ अपने बर्तावों में, विशेष रूप से भगवान् के अन्य भक्त के साथ अपने बर्तावों में, सदैव सचेत रहे।
 
शेयर करें
       
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
  Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.

 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥