श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 16: वैकुण्ठ के दो द्वारपालों, जय-विजय को मुनियों द्वारा शाप  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक
यस्यामृतामलयश:श्रवणावगाह:
सद्य: पुनाति जगदाश्वपचाद्विकुण्ठ: ।
सोऽहं भवद्भय उपलब्धसुतीर्थकीर्ति-
श्छिन्द्यां स्वबाहुमपि व: प्रतिकूलवृत्तिम् ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
यस्य—जिसका; अमृत—अमृत; अमल—दूषणरहित; यश:—यश, महिमा; श्रवण—सुनना; अवगाह:—प्रविष्ट करना; सद्य:—तुरन्त; पुनाति—पवित्र करती है; जगत्—ब्रह्माण्ड; आश्व-पचात्—कुत्ता-भक्षक तक; विकुण्ठ:—चिन्तारहित; स:— वह व्यक्ति; अहम्—मैं हूँ; भवद्भ्य:—आप से; उपलब्ध—प्राप्त; सु-तीर्थ—तीर्थयात्रा का सर्वोत्तम स्थान; कीर्ति:—यश; छिन्द्याम्—काट देगा; स्व-बाहुम्—अपनी भुजा; अपि—भी; व:—तुम्हारे प्रति; प्रतिकूल-वृत्तिम्—शत्रुवत् कार्य करते हुए ।.
 
अनुवाद
 
 सम्पूर्ण संसार में कोई भी व्यक्ति, यहाँ तक कि चण्डाल भी जो कुत्ते का मांस पका कर और खा कर जीता है, वह भी तुरन्त शुद्ध हो जाता है यदि वह मेरे नाम, यश आदि के गुणगान रूपी अमृत में कान से सुनते हुए स्नान करता है। अब आप लोगों ने निश्चित रूप से मेरा साक्षात्कार कर लिया है, अतएव मैं अपनी ही भुजा को काटकर अलग करने में तनिक संकोच नहीं करूँगा, यदि इसका आचरण आपके प्रतिकूल लगे।
 
तात्पर्य
 यदि मानव समाज के सदस्य कृष्णभावनामृत स्वीकार कर लें तो उसका वास्तविक शुद्धिकरण हो सकता है। सारे वैदिक वाङ्मय में इसका स्पष्ट उल्लेख है। जो भी निष्ठापूर्वक कृष्णभावनामृत ग्रहण करता है, वह, सद्व्यवहार में उन्नत न होने पर भी शुद्ध हो जाता है। भक्त का चयन मानव समाज के किसी भी वर्ग से किया जा सकता है, यद्यपि यह आशा नहीं की जाती कि समाज के सारे अंगों के सारे लोग अच्छे व्यवहार वाले हैं। जैसाकि इस श्लोक में तथा भगवद्गीता में कई स्थानों पर कहा गया है कि यदि कोई ब्राह्मण कुल में जन्म न भी ले या यदि वह चण्डालों के परिवार में भी जन्म ले, किन्तु यदि वह केवल कृष्णभावनामृत को ग्रहण करता है, तो वह तुरन्त शुद्ध हो जाता है। भगवद्गीता (९.३०-३२) में स्पष्ट कहा गया है कि चाहे मनुष्य सुन्दर आचरण का न हो, किन्तु यदि वह केवल कृष्णभावनामृत को ग्रहण करता है, तो वह साधु स्वभाव वाला व्यक्ति समझा जाता है। जब तक कोई व्यक्ति इस भौतिक जगत में है, तब तक अन्यों के साथ बर्ताव में उसके दो विभिन्न सम्बन्ध रहते हैं—एक तो शरीर से सम्बन्धित और दूसरा आत्मा से सम्बन्धित। जहाँ तक शारीरिक मामलों या सामाजिक कार्यों का सम्बन्ध है, यद्यपि मनुष्य आध्यात्मिक स्तर पर शुद्ध होता है, किन्तु कभी कभी देखा जाता है कि वह शारीरिक सम्बन्धों के परिपेक्ष्य में कार्य करता है। यदि चण्डाल परिवार में उत्पन्न भक्त कभी कभी अपने स्वभावगत कार्य करता देखा जाता है, तो उसे चण्डाल नहीं समझा जाना चाहिए। दूसरे शब्दों में, वैष्णव का मूल्यांकन उसके शरीर के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। शास्त्र कहते हैं कि मन्दिर के अर्चाविग्रह को कभी कोई काष्ठ या पत्थर का बना हुआ न समझे, न ही कोई यह सोचे कि निम्न जाति से आने वाला व्यक्ति जिसने कृष्णभावनामृत स्वीकार कर लिया है अब भी उसी निम्न जाति का है। ऐसे विचारों का निषेध है, क्योंकि जो भी कृष्णभावनामृत ग्रहण करता है, वह पूर्णतया शुद्ध समझा जाता है। कम से कम, वह शुद्धि की प्रक्रिया में लगा हुआ होता है और यदि वह कृष्णभावनामृत के सिद्धान्त पर दृढ़ रहता है, तो वह शीघ्र ही पूरी तरह से शुद्ध हो जाएगा। निष्कर्ष यह निकला कि यदि कोई गम्भीरता के साथ कृष्णभावनामृत को ग्रहण करता है, तो वह पहले से शुद्ध हुआ माना जाता है और कृष्ण उसे सभी प्रकार से सुरक्षा प्रदान करने के लिए तैयार रहते हैं। यहाँ पर भगवान् विश्वास दिलाते हैं कि वे अपने भक्त को सुरक्षा प्रदान करने के लिए तैयार रहते हैं चाहे उन्हें अपने ही शरीर के एक अंग को काट फेंकने की आवश्यकता क्यों न पड़े।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥