श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 16: वैकुण्ठ के दो द्वारपालों, जय-विजय को मुनियों द्वारा शाप  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक
यत्सेवया चरणपद्मपवित्ररेणुं
सद्य:क्षताखिलमलं प्रतिलब्धशीलम् ।
न श्रीर्विरक्तमपि मां विजहाति यस्या:
प्रेक्षालवार्थ इतरे नियमान् वहन्ति ॥ ७ ॥
 
शब्दार्थ
यत्—जिसकी; सेवया—सेवा द्वारा; चरण—पाँव; पद्म—कमल; पवित्र—पवित्र; रेणुम्—धूल; सद्य:—तुरन्त; क्षत—पोंछी गई; अखिल—समस्त; मलम्—पापों को; प्रतिलब्ध—अर्जित; शीलम्—स्वभाव; न—नहीं; श्री:—लक्ष्मीजी; विरक्तम्—कोई आसक्ति न रखना; अपि—यद्यपि; माम्—मुझको; विजहाति—छोड़ती हैं; यस्या:—लक्ष्मी का; प्रेक्षा-लव-अर्थ:—थोड़ी भी कृपा पाने के लिए; इतरे—अन्य, यथा ब्रह्मा जैसे; नियमान्—पवित्र व्रतों को; वहन्ति—पालन करते हैं ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् ने आगे कहा : चूँकि मैं अपने भक्तों का सहायक हूँ, इसलिए मेरे चरणकमल इतने पवित्र बन चुके हैं कि वे तुरन्त ही सारे पापों को धो डालते हैं और मुझे ऐसा स्वभाव प्राप्त हो चुका है कि देवी लक्ष्मी मुझे छोड़ती नहीं, यद्यपि उसके प्रति मेरा कोई लगाव नहीं है और अन्य लोग उसके सौन्दर्य की प्रशंसा करते हैं तथा उसकी रंचमात्र कृपा पाने के लिए भी पवित्र व्रत रखते हैं।
 
तात्पर्य
 भगवान् तथा उनके भक्त के मध्य का सम्बन्ध दिव्यत: सुन्दर है। जिस तरह भक्त सोचता है कि भगवद्भक्त होने से वह समस्त गुणों में समुन्नत है उसी तरह भगवान् भी सोचते हैं कि सेवक के प्रति उनकी भक्ति के कारण ही उनकी सारी दिव्य महिमाएँ बढ़ गई हैं। दूसरे शब्दों में, जिस तरह भक्त भगवान् की सेवा करने के लिए सदैव उत्सुक रहता है उसी तरह भगवान् भक्त की सेवा करने के लिए सदैव उत्सुक रहते हैं। यहाँ पर भगवान् यह स्वीकार करते हैं कि यद्यपि उनमें निश्चित रूप से ऐसा गुण है कि जिस किसी को उनके चरणकमलों की धूल का कण भी प्राप्त हो जाता है, वह तुरन्त ही महापुरुष बन जाता है, किन्तु यह महानता अपने भक्त के लिए उनके स्नेह के कारण है। इसी स्नेह के कारण लक्ष्मीजी उन्हें छोड़ती नहीं और एक नहीं, हजारों लक्ष्मियाँ उनकी सेवा में लगी रहती हैं। भौतिक जगत में लक्ष्मीजी से रंचमात्र कृपा पाने के लिए लोग तपस्या के अनेक कठोर अनुष्ठानों का पालन करते हैं। भगवान् भक्त की किसी भी असुविधा को सहन नहीं कर पाते। इसीलिए वे भक्तवत्सल के रूप में विख्यात हैं।
 
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