श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 16: वैकुण्ठ के दो द्वारपालों, जय-विजय को मुनियों द्वारा शाप  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक
येषां बिभर्म्यहमखण्डविकुण्ठयोग-
मायाविभूतिरमलाङ्‌घ्रि रज: किरीटै: ।
विप्रांस्तु को न विषहेत यदर्हणाम्भ:
सद्य: पुनाति सहचन्द्रललामलोकान् ॥ ९ ॥
 
शब्दार्थ
येषाम्—ब्राह्मणों का; बिभर्मि—धारण करता हूँ; अहम्—मैं; अखण्ड—अटूट; विकुण्ठ—बिना अवरोध के; योग-माया— अन्तरंगा शक्ति; विभूति:—ऐश्वर्य; अमल—शुद्ध; अङ्घ्रि—पाँवों की; रज:—धूलि; किरीटै:—मेरे मुकुट पर; विप्रान्— ब्राह्मण; तु—लेकिन; क:—कौन; न—नहीं; विषहेत—ले जाते हैं; यत्—भगवान् का; अर्हण-अम्भ:—पाँवों को धोने से प्राप्त जल; सद्य:—तुरन्त; पुनाति—पवित्र बनाता है; सह—सहित; चन्द्र-ललाम—शिवजी; लोकान्—तीनों लोकों को ।.
 
अनुवाद
 
 मैं अपनी अबाधित अन्तरंगा शक्ति का स्वामी हूँ तथा गंगा जल मेरे पाँवों को धोने से निकलता हुआ जल है। वही जल जिसे शिवजी अपने सिर पर धारण किए हुए हैं, उनको तथा तीनों लोकों को पवित्र करता है। यदि मैं वैष्णव के पैरों की धूल को अपने सिर पर धारण करुँ, तो मुझे ऐसा करने से कौन मना करेगा?
 
तात्पर्य
 भगवान् की अन्तरंगा तथा बहिरंगा शक्तियों में अन्तर यह है कि अन्तरंगा शक्ति में अथवा आध्यात्मिक जगत में सभी ऐश्वर्य अविचल रहते हैं जबकि बहिरंगा अथवा भौतिक शक्ति में सारे ऐश्वर्य नश्वर अभिव्यक्ति होते हैं। भगवान् की श्रेष्ठता आध्यात्मिक तथा भौतिक दोनों ही जगतों में समान होती है, किन्तु आध्यात्मिक जगत भगवत्-साम्राज्य कहलाता है और भौतिक जगत माया का साम्राज्य कहलाता है। माया द्योतक है उसकी जो वास्तव में तथ्य नहीं है। भौतिक जगत का ऐश्वर्य प्रतिबिम्बित ऐश्वर्य होता है। भगवद्गीता में कहा गया है कि यह भौतिक जगत उस वृक्ष की तरह है, जिसकी जड़ें ऊपर की ओर तथा शाखाएँ नीचे की ओर होती हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि भौतिक जगत आध्यात्मिक जगत की छाया है। असली ऐश्वर्य तो आध्यात्मिक जगत में रहता है। आध्यात्मिक जगत के अधिष्ठाता देव स्वयं भगवान् हैं जबकि भौतिक जगत में अनेक स्वामी हैं। अन्तरंगा तथा बहिरंगा शक्तियों में यही अन्तर है। भगवान् कहते हैं कि यद्यपि वे ही अन्तरंगा शक्ति के प्रधान कारण हैं और यद्यपि भौतिक जगत उनके पादप्रक्षालित जल से पवित्र बनता है, तो भी उनके मन में ब्राह्मण तथा वैष्णव के प्रति सर्वाधिक आदर रहता है। जब भगवान् स्वयं ही वैष्णव तथा ब्राह्मण को इतना आदर प्रदान करते हैं, तो फिर इन पुरुषों को ऐसा आदर प्रदान करने से कौन इनकार कर सकता है?
 
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥