श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 17: हिरण्याक्ष की दिग्विजय  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक
चक्रे हिरण्यकशिपुर्दोर्भ्यां ब्रह्मवरेण च ।
वशे सपालाँल्लोकांस्त्रीनकुतोमृत्युरुद्धत: ॥ १९ ॥
 
शब्दार्थ
चक्रे—बनाया; हिरण्यकशिपु:—हिरण्यकशिपु; दोर्भ्याम्—अपने दोनों हाथों से; ब्रह्म-वरेण—ब्रह्मा के वरदान से; च—तथा; वशे—नियन्त्रण में; स-पालान्—उनके पालने वालों सहित; लोकान्—लोक; त्रीन्—तीन; अकुत:- मृत्यु:—किसी से भी मृत्यु का भय न होना; उद्धत:—गर्वित, उद्धत ।.
 
अनुवाद
 
 ज्येष्ठ पुत्र हिरण्यकशिपु को तीनों लोकों में किसी से भी अपनी मृत्यु का भय न था, क्योंकि उसे ब्रह्मा से वरदान प्राप्त हुआ था। इस वरदान के कारण यह अत्यन्त दंभी तथा अभिमानी हो गया था और तीनों लोकों को अपने वश में करने में समर्थ था।
 
तात्पर्य
 अगले अध्यायों में पता चलेगा कि ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए हिरण्यकशिपु ने कठिन तपस्या की थी और तब उसे अमर रहने का वरदान प्राप्त हुआ था। वस्तुत: ब्रह्माजी किसी को अमर होने का वर नहीं दे सकते, किन्तु अप्रत्यक्षत: हिरण्यकशिपु ने यह वरदान प्राप्त कर लिया था कि इस भौतिक संसार का कोई भी व्यक्ति उसको मार न सके। दूसरे शब्दों में, चूँकि वह मूलत: वैकुण्ठ धाम से आया था, अत: इस लोक का कोई भी व्यक्ति उसे मार नहीं सकता था। इसीलिए उसे मारने के लिए स्वयं भगवान् को प्रकट होना पड़ा। भले ही कोई अपने ज्ञान के भौतिक विकास पर इतरा ले, किन्तु वह जन्म, मृत्यु, जरा तथा व्याधि इन चार भौतिक नियमों के प्रति निश्चेष्ट नहीं रह सकता। यह भगवान् की योजना थी कि वे जनता को बता दें कि हिरण्यकशिपु जैसा बलशाली व्यक्ति भी निश्चित अवधि से अधिक जीवित नहीं रह सका था। भले ही कोई हिरण्यकशिपु के समान बलशाली तथा अभिमानी और तीनों लोकों को अपने वश में करने वाला क्यों न हो ले, किन्तु उसे चिरकाल तक जीवित रहने या लूट का माल रखने की छूट नहीं है। न जाने कितने सम्राटों ने शासन किया होगा, किन्तु वे सभी अब विस्मृति के गर्भ में विलीन हो गये। यही इस संसार का इतिहास है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥