श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 17: हिरण्याक्ष की दिग्विजय  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक
हिरण्याक्षोऽनुजस्तस्य प्रिय: प्रीतिकृदन्वहम् ।
गदापाणिर्दिवं यातो युयुत्सुर्मृगयन् रणम् ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
हिरण्याक्ष:—हिरण्याक्ष; अनुज:—छोटा भाई; तस्य—उसका; प्रिय:—प्रिय; प्रीति-कृत्—प्रसन्न करने के लिए उद्यत; अनु-अहम्—प्रतिदिन; गदा-पाणि:—गदा धारण किये; दिवम्—उच्च लोकों को; यात:—घूमा; युयुत्सु:—लडऩे की इच्छावाला; मृगयन्—खोजते हुए; रणम्—युद्ध ।.
 
अनुवाद
 
 छोटा भाई हिरण्याक्ष अपने कार्यों से अपने अग्रज भ्राता को प्रसन्न रखने के लिए उद्यत रहता था। हिरण्यकशिपु को प्रसन्न रखने के उद्देश्य से ही उसने अपने कंधे पर गदा रखी और लडऩे की इच्छा से पूरे ब्रह्माण्ड में घूम आया।
 
तात्पर्य
 यह आसुरी प्रवृत्ति है कि परिवार के सभी सदस्यों को अपनी इन्द्रिय-तृप्ति के लिए इस ब्रह्माण्ड के समस्त साधनों का उपभोग करना सिखाया जाय जब कि दैवी प्रवृत्ति भगवान् की सेवा में प्रत्येक वस्तु को लगाने के लिए प्रेरित करती है। हिरण्यकशिपु स्वयं अत्यन्त बलशाली था और उसने अपने छोटे भाई हिरण्याक्ष को भी बलवान बनाया था जिससे वह हर एक से लडऩे और प्रकृति पर जहाँ तक सम्भव हो, स्वामित्व प्राप्त करने में उसकी सहायता कर सके और यदि सम्भव हो तो वह सदा के लिए ब्रह्माण्ड पर शासन करना चाहता था। ये सब आसुरी जीव की प्रवृत्ति के प्रदर्शन हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥