श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 17: हिरण्याक्ष की दिग्विजय  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक
मनोवीर्यवरोत्सिक्तमसृण्यमकुतोभयम् ।
भीता निलिल्यिरे देवास्तार्क्ष्यत्रस्ता इवाहय: ॥ २२ ॥
 
शब्दार्थ
मन:-वीर्य—मनोबल तथा शारीरिक बल; वर—वरदान से; उत्सिक्तम्—दंभी, गर्वीला; असृण्यम्—रोक पाने में असमर्थ; अकुत:-भयम्—किसी से न डरने वाला; भीता:—डरे हुए; निलिल्यिरे—छिपा लिया; देवा:—देवताओं ने; तार्क्ष्य—गरुड़ से; त्रस्ता:—भयभीत; इव—के समान; अहय:—सर्प ।.
 
अनुवाद
 
 उसके मनोबल, शारीरिक बल तथा ब्रह्मा द्वारा प्राप्त वरदान ने उसे दंभी बना दिया था। उसे न तो किसी से अपनी मृत्यु का भय था और न उस पर किसी का अंकुश था। अत: देवता उसे देखकर ही भयभीत हो उठते थे और अपने को उसी प्रकार छिपा लेते जिस तरह गरुड़ के भय से सर्प छिप जाते हैं।
 
तात्पर्य
 जैसाकि यहाँ पर वर्णन हुआ है, सामान्य रूप से असुर अत्यन्त बलिष्ठ होते हैं, अत: उनकी मानसिक दशा भी ठीक रहती है और उनका शौर्य असाधारण होता है। हिरण्याक्ष तथा हिरण्यकशिपु इस ब्रह्माण्ड के भीतर किसी के द्वारा न मारे जा सकने का वर प्राप्त करके प्राय: अमर बन गये थे और पूर्णतया निर्भय हो चले थे।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥