श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 17: हिरण्याक्ष की दिग्विजय  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक
तस्मिन् प्रविष्टे वरुणस्य सैनिका
यादोगणा: सन्नधिय: ससाध्वसा: ।
अहन्यमाना अपि तस्य वर्चसा
प्रधर्षिता दूरतरं प्रदुद्रुवु: ॥ २५ ॥
 
शब्दार्थ
तस्मिन् प्रविष्टे—समुद्र में घुसने पर; वरुणस्य—वरुण के; सैनिका:—रक्षक; याद:-गणा:—जलचर जीव; सन्न धिय:—हकबकाये हुए; स-साध्वसा:—डर से; अहन्यमाना:—न मारा जाकर; अपि—भी; तस्य—उनकी; वर्चसा— धाक से; प्रधर्षिता:—घबड़ाकर; दूर-तरम्—बहुत दूर; प्रदुद्रुवु:—तेजी से भाग गये ।.
 
अनुवाद
 
 समुद्र में उसके प्रवेश करते ही वरुण के सैनिक समस्त जलचर प्राणी डर गये और बहुत दूर भाग गये। इस प्रकार बिना वार किये ही हिरण्याक्ष ने अपनी धाक जमा ली।
 
तात्पर्य
 भी-कभी भौतिकतावादी असुर अत्यधिक बलशाली प्रतीत होते हैं और सारे संसार में अपना प्रभुत्व स्थापित करते दिखाई पड़ते हैं। यहाँ पर, हिरण्याक्ष ने अपनी आसुरी शक्ति से पूरे ब्रह्माण्ड में अपनी धाक जमा ली थी और देवतागण उसकी असाधारण शक्ति से भयभीत हो उठे थे। हिरण्यकशिपु तथा हिरण्याक्ष से न केवल अन्तरिक्ष में देवता भयभीत जान पड़े, वरन् समुद्र के जल जीव भी भयभीत थे।
 
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥