श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 17: हिरण्याक्ष की दिग्विजय  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक
स वर्षपूगानुदधौ महाबल-
श्चरन्महोर्मीञ्‍छ्वसनेरितान्मुहु: ।
मौर्व्याभिजघ्ने गदया विभावरी-
मासेदिवांस्तात पुरीं प्रचेतस: ॥ २६ ॥
 
शब्दार्थ
स:—वह; वर्ष-पूगान्—अनेक वर्षों तक; उदधौ—समुद्र में; महा-बल:—शक्तिशाली; चरन्—घूमते हुए; महा ऊर्मीन्—उत्ताल तरंगें; श्वसन—वायु से; ईरितान्—ऊपर नीचे उठते हुए; मुहु:—पुन: पुन:; मौर्व्या—लोहे की; अभिजघ्ने—वार किया; गदया—गदा से; विभावरीम्—विभावरी; आसेदिवान्—पहुँचा; तात—हे विदुर; पुरीम्— राजधानी; प्रचेतस:—वरुण की ।.
 
अनुवाद
 
 हे विदुर, वह महाबली हिरण्याक्ष अनेकानेक वर्षों तक समुद्र में घूमता हुआ वायु से दोलायमान उत्ताल तरंगों पर अपनी लोहे की गदा से बारम्बार प्रहार करता हुआ वरुण की राजधानी विभावरी में जा पहुँचा।
 
तात्पर्य
 रुण को जल का प्रमुख देवता माना जाता है और विभावरी नाम से विख्यात उसकी राजधानी उसके जल-साम्राज्य के भीतर है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥