श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 17: हिरण्याक्ष की दिग्विजय  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक
त्वं लोकपालोऽधिपतिर्बृहच्छ्रवा
वीर्यापहो दुर्मदवीरमानिनाम् ।
विजित्य लोकेऽखिलदैत्यदानवान्
यद्राजसूयेन पुरायजत्प्रभो ॥ २८ ॥
 
शब्दार्थ
त्वम्—तुम (वरुण); लोक-पाल:—लोक का रक्षक; अधिपति:—शासक; बृहत्-श्रवा:—कीर्तिवान्; वीर्य— शक्ति; अपह:—घटा हुआ; दुर्मद—घमंडी का; वीर-मानिनाम्—अपने को महान् वीर समझते हुए; विजित्य— जीतकर; लोके—संसार में; अखिल—समस्त; दैत्य—असुर; दानवान्—दानवों को; यत्—जहाँ से; राज-सूयेन— राजसूय यज्ञ द्वारा; पुरा—प्राचीनकाल में; अयजत्—पूजा की; प्रभो—हे भगवान् ।.
 
अनुवाद
 
 आप समस्त गोलक के रक्षक तथा अत्यन्त कीर्तिवान शासक हैं। आपने अहंकारी तथा मोहग्रस्त वीरों के दर्प को दल कर तथा इस संसार के सभी दैत्यों तथा दानवों को जीत कर भगवान् के हेतु एक बार राजसूय यज्ञ सम्पन्न किया था।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥