श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 17: हिरण्याक्ष की दिग्विजय  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक
उत्पाता बहवस्तत्र निपेतुर्जायमानयो: ।
दिवि भुव्यन्तरिक्षे च लोकस्योरुभयावहा: ॥ ३ ॥
 
शब्दार्थ
उत्पाता:—प्राकृतिक उपद्रव; बहव:—अनेक; तत्र—वहाँ; निपेतु:—घटित हुए; जायमानयो:—उनके जन्म के समय; दिवि—स्वर्गलोक में; भुवि—पृथ्वी पर; अन्तरिक्षे—बाह्य आकाश में; च—तथा; लोकस्य—संसार का; उरु— अत्यधिक; भय-आवहा:—भय उत्पन्न करने वाला, भयानक ।.
 
अनुवाद
 
 दोनों असुरों के जन्म के समय स्वर्गलोक, पृथ्वीलोक तथा इन दोनों के मध्य के लोकों में अनेक प्राकृतिक उपद्रव हुए जो अत्यन्त भयावने एवं विस्मयपूर्ण थे।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥