श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 17: हिरण्याक्ष की दिग्विजय  »  श्लोक 5

 
श्लोक
ववौ वायु: सुदु:स्पर्श: फूत्कारानीरयन्मुहु: ।
उन्मूलयन्नगपतीन्वात्यानीको रजोध्वज: ॥ ५ ॥
 
शब्दार्थ
ववौ—बहने लगीं; वायु:—हवाएँ; सु-दु:स्पर्श:—छूने में बुरी लगने वाली; फूत्-कारान्—साँय-साँय का शब्द; ईरयन्—निकालती हुई; मुहु:—पुन:पुन:; उन्मूलयन्—उखाड़ती हुई; नग-पतीन्—विशाल वृक्षों को; वात्या—अंधड़; अनीक:—सेनाएँ; रज:—धूल; ध्वज:—झंडे, पताकाएँ ।.
 
अनुवाद
 
 बारम्बार साँय-साँय करती तथा विशाल वृक्षों को उखाड़ती हुई अत्यन्त दुस्सह स्पर्शी हवाएँ बहने लगीं। उस समय अंधड़ उनकी सेनाएँ और धूल के मेघ उनकी ध्वजाएँ लग रही थीं।
 
तात्पर्य
 जब अंधड़ चले, अत्यधिक गर्मी या हिमपात हो और तूफानी हवाओं से वृक्ष उखड़ जाँय, तो यह समझना चाहिए कि आसुरी जनसंख्या बढ़ रही है, जिसके कारण ये प्राकृतिक उत्पात हो रहे हैं। आज भी इस विश्व में अनेक ऐसे देश हैं जहाँ ये सभी उत्पात हो रहे हैं। यह सारे संसार में
सत्य है। वहाँ पर्याप्त धूप नहीं रहती, आकाश सदैव बादलों से घिरा रहता है, बर्फ गिरती है और कड़ाके की सर्दी पड़ती है। इनसे इसकी पुष्टि होती है कि ऐसे स्थानों में उन आसुरी लोगों का निवास है, जो सभी प्रकार के वर्जित पापमय कार्य करने के आदी हो गये हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥