श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 18: भगवान् वराह तथा असुर हिरण्याक्ष के मध्य युद्ध  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक
मैत्रेय उवाच
तदेवमाकर्ण्य जलेशभाषितं
महामनास्तद्विगणय्य दुर्मद: ।
हरेर्विदित्वा गतिमङ्ग नारदाद्
रसातलं निर्विविशे त्वरान्वित: ॥ १ ॥
 
शब्दार्थ
मैत्रेय:—परम संत मैत्रेय ने; उवाच—कहा; तत्—वह; एवम्—इस प्रकार; आकर्ण्य—सुनकर; जल-ईश—जल का स्वामी, वरुण का; भाषितम्—शब्द; महा-मना:—घमंडी; तत्—वे शब्द; विगणय्य—उपेक्षा करके; दुर्मद:— अहंकारी; हरे:—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के; विदित्वा—पता लगाकर; गतिम्—पता; अङ्ग—हे विदुर; नारदात्— नारद से; रसातलम्—समुद्र के नीचे; निर्विविशे—प्रवेश किया; त्वरा-अन्वित:—अत्यन्त वेग से ।.
 
अनुवाद
 
 मैत्रेय ने आगे कहा—उस घंमडी तथा अभिमानी दैत्य ने वरुण के शब्दों की तनिक भी परवाह नहीं की। हे विदुर, उसे नारद से श्रीभगवान् के बारे में पता लगा और वह अत्यन्त वेग से समुद्र की गहराइयों में पहुँच गया।
 
तात्पर्य
 युद्धप्रिय भौतिकतावादी अपने परम बलशाली शत्रु श्रीभगवान् से भी लडऩे में नहीं डरते। वरुण से यह जानकर कि एक ऐसा योद्धा है, जिससे वह सचमुच लड़ सकता है, वह असुर अत्यन्त प्रोत्साहित हुआ। वह श्रीभगवान् को ढ़ूँढऩे के लिए उतावला हो उठा जिससे वह युद्ध कर सके, यद्यपि वरुण ने भविष्यवाणी कर दी थी कि विष्णु से युद्ध करने पर वह कुत्तों, सियारों तथा गीधों का भोजन बन जाएगा। चूँकि आसुरी लोग कम बुद्धिमान होते हैं, अत: वे अजित कहे जाने वाले विष्णु से भी लडऩे के लिए तत्पर हो जाते हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥