श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 18: भगवान् वराह तथा असुर हिरण्याक्ष के मध्य युद्ध  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक
श्रीभगवानुवाच
सत्यं वयं भो वनगोचरा मृगा
युष्मद्विधान्मृगये ग्रामसिंहान् ।
न मृत्युपाशै: प्रतिमुक्तस्य वीरा
विकत्थनं तव गृह्णन्त्यभद्र ॥ १० ॥
 
शब्दार्थ
श्री-भगवान् उवाच—श्रीभगवान् ने कहा; सत्यम्—निस्सन्देह; वयम्—हम; भो:—अरे; वन-गोचरा:—जंगल में वास करने वाले; मृगा:—प्राणी; युष्मत्-विधान्—तुम्हारे जैसों को; मृगये—मारने के लिए खोज रहा हूँ; ग्राम-सिंहान्—कुत्ते; न—नहीं; मृत्यु-पाशै:—मृत्यु के फन्दे से; प्रतिमुक्तस्य—बद्धजीवों का; वीरा:—वीर पुरुष; विकत्थनम्— आत्मश्लाघा; तव—तुम्हारा; गृह्णन्ति—ध्यान देते हैं; अभद्र—अरे दुष्ट ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् ने कहा—सचमुच हम जंगल के प्राणी हैं और तुम जैसे ही शिकारी कुत्तों का हम पीछा कर रहे हैं। जो मृत्यु के बन्धन से मुक्त हो चुका है, वह तुम्हारी आत्मश्लाघा से नहीं डरता, क्योंकि तुम मृत्यु-बन्धन के नियमों से बँधे हुए हो।
 
तात्पर्य
 भले ही असुर तथा नास्तिक लोग श्रीभगवान् का लगातार अपमान करें, किन्तु वे यह भूल जाते हैं कि वे जन्म-मृत्यु के नियमों से बँधे हैं। वे सोचते हैं कि परमेश्वर के अस्तित्व को नकारने मात्र से अथवा प्रकृति के कठोर नियमों का अतिक्रमण करने से वे जन्म-मृत्यु के चंगुल से बच सकते हैं। भगवद्गीता में कहा गया है कि ईश्वर की दिव्य प्रकृति को समझ लेने मात्र से मनुष्य भगवान् के धाम लौट सकता है। असुर तथा नास्तिक लोग भगवान् के स्वभाव से परिचित नहीं होना चाहते, फलत: वे जन्म-मृत्यु के बन्धन में पड़े रहते हैं।
 
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