श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 18: भगवान् वराह तथा असुर हिरण्याक्ष के मध्य युद्ध  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक
एते वयं न्यासहरा रसौकसां
गतह्रियो गदया द्रावितास्ते ।
तिष्ठामहेऽथापि कथञ्चिदाजौ
स्थेयं क्‍व यामो बलिनोत्पाद्य वैरम् ॥ ११ ॥
 
शब्दार्थ
एते—अपने आप; वयम्—हम; न्यास—धरोहर का; हरा:—चोर; रसा-ओकसाम्—रसातल के वासियों का; गत ह्रिय:—निर्लज्ज; गदया—गदा से; द्राविता:—पीछा किया जाकर; ते—तुम्हारा; तिष्ठामहे—हम बैठे रहेंगे; अथ अपि—तो भी; कथञ्चित्—कुछ-कुछ; आजौ—युद्धभूमि में; स्थेयम्—हम ठहर सकें; क्व—कहाँ; याम:—हम जा सकते हैं; बलिना—शक्तिशाली शत्रु से; उत्पाद्य—उत्पन्न करके; वैरम्—शत्रुता ।.
 
अनुवाद
 
 निस्सन्देह, मैंने रसातलवासियों की धरोहर चुरा ली है और सारी शर्म खो दी है। यद्यपि तुम्हारी शक्तिशाली गदा से मुझे कष्ट हो रहा है, किन्तु मैं जल में कुछ काल तक और रहूँगा क्योंकि तुम जैसे पराक्रमी शत्रु से शत्रुता ठान कर अन्यत्र जाने के लिए मेरे पास कोई ठौर भी नहीं है।
 
तात्पर्य
 असुर को समझ लेना चाहिए था कि ईश्वर को किसी दूसरे स्थान में नहीं भगाया जा सकता था क्योंकि वह सर्वव्यापी है। असुर अपनी अधिकृत भूमि को अपनी सम्पत्ति मानते हैं, किन्तु वास्तव में प्रत्येक वस्तु पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की है। वह जब चाहे कोई भी वस्तु ले सकता है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥