श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 18: भगवान् वराह तथा असुर हिरण्याक्ष के मध्य युद्ध  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक
भगवांस्तु गदावेगं विसृष्टं रिपुणोरसि ।
अवञ्चयत्तिरश्चीनो योगारूढ इवान्तकम् ॥ १५ ॥
 
शब्दार्थ
भगवान्—भगवान्; तु—लेकिन; गदा-वेगम्—गदा के प्रहार को; विसृष्टम्—चलाया गया; रिपुणा—शत्रु द्वारा; उरसि—वक्षस्थल पर; अवञ्चयत्—धोखा देते हुए; तिरश्चीन:—एक ओर; योग-आरूढ:—सिद्ध योगी; इव—सदृश; अन्तकम्—मृत्यु ।.
 
अनुवाद
 
 किन्तु भगवान् ने एक ओर सरक कर शत्रु द्वारा अपने वक्षस्थल पर चलाई गई गदा के प्रखर प्रहार को उसी प्रकार झुठला दिया जिस प्रकार सिद्ध योगी मृत्यु को चकमा दे देता है।
 
तात्पर्य
 यहाँ यह उदाहरण दिया गया है कि परम योगी प्राकृतिक नियमों से प्रदत्त मृत्यु को भी जीत सकता है। भगवान् के दिव्य शरीर पर शक्तिशाली गदा से प्रहार करना असुर के लिए निष्प्रयोजन होता है, क्योंकि भगवान् के शौर्य से कोई पार नहीं पा सकता। सिद्ध योगी प्रकृति के नियमों से मुक्त होते हैं, अत: उन पर मृत्यु का
भी वश नहीं चलता। ऊपर-ऊपर से ऐसा लगता है कि योगी पर मृत्यु का प्रहार हो रहा है, किन्तु भगवान् की सेवा करते रहने के लिए वह उन की कृपा से ऐसे अनेक प्रहारों पर विजय प्राप्त कर लेता है। चूँकि भगवान् अपने शौर्य के बल पर स्वच्छन्द रहते हैं, अत: भक्त भी उनके अनुग्रह से उनकी सेवा के लिए जीवित रहते हैं।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥