श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 18: भगवान् वराह तथा असुर हिरण्याक्ष के मध्य युद्ध  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक
तयो: स्पृधोस्तिग्मगदाहताङ्गयो:
क्षतास्रवघ्राणविवृद्धमन्य्वो: ।
विचित्रमार्गांश्चरतोर्जिगीषया
व्यभादिलायामिव शुष्मिणोर्मृध: ॥ १९ ॥
 
शब्दार्थ
तयो:—उन दोनों में; स्पृधो:—दोनों प्रतिस्पर्धा करने वाले; तिग्म—नुकीली; गदा—गदाओं से; आहत—घायल; अङ्गयो:—उनके शरीर; क्षत-आस्रव—घावों से बहता रक्त; घ्राण—गन्ध; विवृद्ध—बढ़ गई; मन्य्वो:—क्रोध; विचित्र—अनेक प्रकार के; मार्गान्—चालें; चरतो:—करते हुए; जिगीषया—जीतने की इच्छा से; व्यभात्—के समान प्रतीत होता था; इलायाम्—गाय (अथवा पृथ्वी) के लिए; इव—सदृश; शुष्मिणो:—दो साँड़ों की; मृध:— मुठभेड़ ।.
 
अनुवाद
 
 दोनों योद्धाओं में तीखी स्पर्धा थी, दोनों के शरीरों पर एक दूसरे की नुकीली गदाओं से चोटें लगी थीं और अपने-अपने शरीर से बहते हुए रक्त की गन्ध से वे अधिकाधिक क्रुद्ध हो चले थे। जीतने की उत्कण्ठा से वे तरह-तरह की चालें चल रहे थे और उनकी यह मुठभेड़ वैसी ही प्रतीत होती थी जैसे किसी गाय के लिए दो बलवान् साँड़ लड़ रहे हों।
 
तात्पर्य
 यहाँ पर पृथ्वीलोक को इला कहा गया है। पृथ्वी पहले इलावृत-वर्ष कहलाती थी, किन्तु जब महाराज परीक्षित ने पृथ्वी पर शासन किया, तो यह भारतवर्ष कहलाती थी। वास्तव में भारतवर्ष पूरे लोक का नाम है, किन्तु कालान्तर में भारतवर्ष से भारत (इंडिया) का बोध होने लगा है। जिस प्रकार कुछ काल पूर्व भारत का विभाजन पाकिस्तान तथा हिन्दुस्तान में हुआ उसी प्रकार पृथ्वी पहले इलावृत-वर्ष कहलाती थी, किन्तु ज्यों ज्यों समय बीतता गया इसकी अनेक राष्ट्रों की सीमाओं में बटंता गया।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥