श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 18: भगवान् वराह तथा असुर हिरण्याक्ष के मध्य युद्ध  »  श्लोक 20

 
श्लोक
दैत्यस्य यज्ञावयवस्य माया-
गृहीतवाराहतनोर्महात्मन: ।
कौरव्य मह्यां द्विषतोर्विमर्दनं
दिद‍ृक्षुरागाद‍ृषिभिर्वृत: स्वराट् ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
दैत्यस्य—असुर का; यज्ञ-अवयवस्य—श्रीभगवान् का (यज्ञ जिसके शरीर का एक अंग है); माया—अपनी शक्ति से; गृहीत—धारण किया गया; वाराह—सूकर का; तनो:—जिसका रूप; महा-आत्मन:—परमेश्वर का; कौरव्य—हे विदुर (कौरवों के वंशज); मह्याम्—संसार के कल्याण हेतु; द्विषतो:—दोनों शत्रुओं का; विमर्दनम्—युद्ध; दिदृक्षु:—देखने के लिए इच्छुक; आगात्—आये; ऋषिभि:—ऋषियों द्वारा; वृत:—साथ साथ आये हुए; स्वराट्— ब्रह्मा ।.
 
अनुवाद
 
 हे कुरुवंशी, वाराह रूप में प्रकट श्री भगवान् तथा असुर के मध्य विश्व के निमित्त होने वाले इस भयंकर युद्ध को संसार के हेतु देखने के लिए ब्रह्माण्ड के परम स्वतन्त्र देवता ब्रह्मा अपने अनुयायियों सहित आये।
 
तात्पर्य
 पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् तथा असुर के युद्ध की तुलना गाय के लिए लडऩे वाले दो साँड़ों के युद्ध से की गई है। पृथ्वी लोक को गो अर्थात् गाय भी कहा जाता है। जिस प्रकार गाय से संसर्ग करने के लिए दो साँड़ परस्पर लड़ते हैं उसी प्रकार से इस पृथ्वी पर आधिपत्य जमाने के लिए असुरों तथा परमेश्वर या उनके प्रतिनिधियों के मध्य अनवरत संग्राम चलता रहता है। यहाँ पर भगवान् को यज्ञावयव के रूप में विशेषरूप से वर्णित किया गया है। किसी को यह नहीं सोचना चाहिए कि भगवान् का शरीर सामान्य शूकर का था। वे कोई भी रूप धारण कर सकते हैं और वे ऐसे रूपों से नित्य युक्त रहते हैं। उन्हीं से सारे रूपों का उदय हुआ है। उनके वराद्र रूपी शरीर को सामान्य शूकर नहीं मानना चाहिए, उनका शरीर वास्तव में यज्ञ से पूर्ण रहता है। यज्ञ (हवि) विष्णु को प्रदान किया जाता है। यज्ञ का अर्थ है भगवान् विष्णु का शरीर। उनका शरीर भौतिक नहीं होता, अत: उन्हें सामान्य शूकर नहीं समझना चाहिए।
इस श्लोक में ब्रह्मा को स्वराट् कहा गया है। वस्तुत: पूर्ण स्वतन्त्रता तो भगवान् को ही प्राप्त है, किन्तु भगवान् का अंश होने से प्रत्येक जीवात्मा में कुछ न कुछ स्वतन्त्रता निहित है। ब्रह्मा को समस्त जीवात्माओं में प्रमुख होने के कारण अन्यों की अपेक्षा कुछ अधिक स्वतन्त्रता प्राप्त है। वे भगवान् श्रीकृष्ण के प्रतिनिधि हैं और सांसारिक व्यापारों की अध्यक्षता करने के लिए नियुक्त हैं। अन्य सभी देवता उनके लिए कार्य करते हैं इसीलिए उन्हें यहाँ स्वराट् कहा गया है। महान् ऋषि तथा योगी सदैव उनके साथ-साथ रहते हैं, अत: वे सभी, असुर तथा भगवान् का युद्ध देखने के लिए आये थे।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥