श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 18: भगवान् वराह तथा असुर हिरण्याक्ष के मध्य युद्ध  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक
आहैनमेह्यज्ञ महीं विमुञ्च नो
रसौकसां विश्वसृजेयमर्पिता ।
न स्वस्ति यास्यस्यनया ममेक्षत:
सुराधमासादितसूकराकृते ॥ ३ ॥
 
शब्दार्थ
आह—हिरण्याक्ष ने कहा; एनम्—भगवान् से; एहि—आओ और लड़ो; अज्ञ—अरे मूर्ख; महीम्—पृथ्वी को; विमुञ्च—छोड़ दो; न:—हमारे लिए; रसा-ओकसाम्—निम्न लोकों के वासियों का; विश्व-सृजा—ब्रह्माण्ड की सृष्टि करने वाले के द्वारा; इयम्—यह पृथ्वी; अर्पिता—अर्पित; न—नहीं; स्वस्ति—कल्याण; यास्यसि—तुम जाओगे; अनया—इसके साथ; मम ईक्षत:—मेरे देखते देखते; सुर-अधम—हे देवताओं में नीच; आसादित—लेकर; सूकर- आकृते—वराह का रूप ।.
 
अनुवाद
 
 असुर ने भगवान् को सम्बोधित करते हुए कहा—सूकर का रूप धारण किये हुए हे देवश्रेष्ठ, थोड़ा सुनिये तो। यह पृथ्वी हम अधोलोक के वासियों को सौंपी जा चुकी है, अत: तुम इसे मेरी उपस्थिति में मुझसे बचकर नहीं ले जा सकते।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक की टीका करते हुए श्रीधर स्वामी कहते हैं कि यद्यपि वह असुर वराह रूपी श्रीभगवान् का उपहास करना चाहता था, किन्तु वास्तव में उसने अनेक शब्दों से उनकी पूजा की। उदाहरणार्थ, उसने उन्हें वन-गोचर कहकर सम्बोधित किया जिसका अर्थ है, “जो वन का वासी है,” किन्तु “वनगोचर” का एक दूसरा भी अर्थ है, “जो जल में लेटा रहता है।” विष्णु जलशायी हैं, अत: परम पुरुषोत्तम भगवान् का यह सही सम्बोधन है। उस असुर ने उन्हें “मृग” कहकर सम्बोधित किया जिससे अनिच्छित यह अभिव्यक्त होता है कि भगवान् की खोज बड़े-बड़े ऋषि मुनि तथा दिव्य ज्ञानी करते रहते हैं। उसने उन्हें “अज्ञ” कहकर सम्बोधित किया। श्रीधर स्वामी कहते हैं कि, “ज्ञ” का अर्थ ज्ञान है, अत: कोई ऐसा ज्ञान नहीं जो भगवान् को ज्ञात न हो। अत: असुर ने अप्रत्यक्ष रूप से कहा कि विष्णु सर्वज्ञाता हैं। असुर ने उन्हें सुराधम भी कहा। सुर का अर्थ ‘देवता’ है और अधम का अर्थ है ‘सबों’ का। वे समस्त देवताओं के भगवान् हैं, अत: वे समस्त देवताओं में श्रेष्ठ हैं। जब असुर ने ‘मेरी उपस्थिति’ वाक्यांश का प्रयोग किया, तो उसका यही अर्थ था, “मेरे उपस्थित रहने पर भी आप पृथ्वी को ले जा सकते हैं।” न स्वस्ति यास्यसि—“जब तक कृपा करके आप इस पृथ्वी को हमारी निगरानी से ले नहीं लेते तब तक हमारा कल्याण नहीं।”
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥